सूरजपुर में 11वां कोया पुनेम राष्ट्रीय आदिवासी प्रशिक्षण शिविर प्रारंभ। चार दिवसीय आवासीय शिविर से आदिवासी युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की ऐतिहासिक पहल
सूरजपुर,/ गोटगंवा /प्रतापपुर – 25 दिसंबर 2025
छत्तीसगढ़ के उत्तर-पूर्वी अंचल में स्थित सूरजपुर जिला एक बार फिर आदिवासी चेतना, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का साक्षी बना, जब प्रतापपुर विकासखंड के गोंटगवां ग्राम स्थित आदिवासी भवन ग्राउंड में 11वां कोया पुनेम आर्थिक गंड व्यवस्था राष्ट्रीय आदिवासी प्रशिक्षण शिविर 2025 का भव्य शुभारंभ हुआ। यह चार दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण शिविर 25 दिसंबर से 28 दिसंबर 2025 तक आयोजित किया जा रहा है, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए आदिवासी युवक-युवतियाँ भाग ले रहे हैं।

यह शिविर केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक सशक्तीकरण की दिशा में एक संगठित आंदोलन का स्वरूप ले चुका है। पिछले 11 वर्षों से निरंतर आयोजित हो रही इस श्रृंखला ने आदिवासी युवाओं को रोजगार, कौशल, स्वावलंबन और आत्मसम्मान के पथ पर आगे बढ़ाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।
कोया पुनेम : एक जीवन दर्शन
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कोया पुनेम केवल एक शब्द या आयोजन नहीं, बल्कि यह आदिवासी समाज का प्राकृतिक जीवन दर्शन है। कोया पुनेम का मूल भाव प्रकृति, समाज और मानव के बीच संतुलन बनाए रखने पर आधारित है। यह दर्शन आदिवासी समाज को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए आधुनिक चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा देता है।

आज जब वैश्वीकरण और बाजारवाद के प्रभाव से आदिवासी समाज की पारंपरिक आजीविका, संस्कृति और सामाजिक संरचना प्रभावित हो रही है, ऐसे समय में कोया पुनेम आधारित प्रशिक्षण शिविर आदिवासी युवाओं को अपनी पहचान बनाए रखते हुए आत्मनिर्भर बनने का मार्ग दिखाता है।
शिविर का उद्देश्य : बेरोजगारी से मुक्ति, आत्मनिर्भरता की ओर कदम
इस राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर का मुख्य उद्देश्य आदिवासी युवाओं और युवतियों को बेरोजगारी से मुक्ति दिलाकर उन्हें स्वावलंबी बनाना है। आयोजकों का मानना है कि यदि युवाओं को सही मार्गदर्शन, कौशल और अवसर प्रदान किए जाएँ, तो वे न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे समाज के विकास में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
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शिविर में विशेष रूप से निम्न बिंदुओं पर फोकस किया गया है— कौशल विकास एवं स्वरोजगार
पारंपरिक आदिवासी आजीविका का आधुनिकीकरण
आर्थिक गंड व्यवस्था की समझ
सामाजिक नेतृत्व और संगठन क्षमता
आदिवासी अधिकार, संविधान और कानून की जानकारी
सांस्कृतिक चेतना एवं पहचान का संरक्षण
पहले दिन ही 280 से अधिक पंजीकरण
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शिविर के उद्घाटन दिवस पर ही लगभग 280 प्रतिभागियों का पंजीकरण हो जाना इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी समाज के बीच इस प्रशिक्षण शिविर की गहरी स्वीकार्यता और आवश्यकता है। प्रतिभागियों में बड़ी संख्या में युवा लड़के-लड़कियाँ शामिल हैं, जो भविष्य को लेकर गंभीर और सजग हैं।

इस शिविर में न केवल छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों—सूरजपुर, बलरामपुर, कोरिया, जशपुर, सरगुजा, कोरबा, रायगढ़ आदि—से प्रतिभागी आए हैं, बल्कि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से भी आदिवासी युवा इसमें भाग लेने पहुँचे हैं। इससे यह शिविर सही मायनों में राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर चुका है।
सर्व आदिवासी समाज की भूमिका
इस चार दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन सर्व आदिवासी समाज के तत्वावधान में किया गया है। सर्व आदिवासी समाज लंबे समय से आदिवासी अधिकार, सामाजिक न्याय, शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए कार्य करता आ रहा है।
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संगठन का मानना है कि केवल आंदोलनों और मांगों से नहीं, बल्कि व्यवहारिक प्रशिक्षण, आर्थिक सशक्तिकरण और युवाओं को नेतृत्व सौंपने से ही समाज आगे बढ़ सकता है। यही सोच इस शिविर की आधारशिला है।

बी.पी.एस. पोया का संदेश : युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना समय की मांग
सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग के जिला अध्यक्ष एवं सामाजिक कार्यकर्ता बी.पी.एस. पोया ने शिविर के दौरान युवाओं को संबोधित करते हुए कहा—
> “आज आदिवासी समाज का सबसे बड़ा संकट बेरोजगारी है। हमारे युवा प्रतिभाशाली हैं, मेहनती हैं, लेकिन उन्हें सही दिशा और अवसर नहीं मिल पाते। यह शिविर उसी दिशा में एक प्रयास है, जहाँ युवाओं को कौशल, जानकारी और आत्मविश्वास दिया जाएगा।”
उन्होंने समाज के सभी वर्गों से अपील की कि वे शिविर के शेष दिनों में सक्रिय भागीदारी निभाएँ और युवाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। पोया ने यह भी कहा कि इस तरह के प्रशिक्षण शिविरों से आदिवासी समाज आर्थिक रूप से मजबूत होगा और आत्मसम्मान के साथ मुख्यधारा में अपनी भूमिका निभा सकेगा।गोंडवाना रत्न मोतीरावण कंगाली जी की जयंती पर शिवनंदनपुर में गोंडी भाषा दिवस का भव्य आयोजन
प्रशिक्षण सत्रों की रूपरेखा
चार दिवसीय शिविर के दौरान विभिन्न विषयों पर प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें विशेषज्ञ वक्ता, अनुभवी समाजसेवी और प्रशिक्षक अपने विचार साझा कर रहे हैं। प्रमुख प्रशिक्षण सत्रों में शामिल हैं—
1. कौशल विकास एवं स्वरोजगार के अवसर
2. कृषि आधारित उद्यमिता और वनोपज प्रबंधन
3. पारंपरिक हस्तशिल्प एवं आधुनिक बाजार
4. आर्थिक गंड व्यवस्था की समझ
5. युवाओं में नेतृत्व विकास
6. आदिवासी संस्कृति, भाषा और पहचान
7. संवैधानिक अधिकार एवं सरकारी योजनाएँ
इन सत्रों के माध्यम से युवाओं को केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यवहारिक जानकारी भी दी जा रही है।
आयोजक मंडल की सराहनीय भूमिका
इस शिविर के सफल आयोजन में एक समर्पित आयोजक मंडल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आयोजक मंडल में—
डॉ. नारवेन कासव टेकाम ,देवचंद पंडो
चंद्रिका प्रसाद आयाम ,रजनी टेकाम ,रामबिलास सरुता
राजेश मरकाम , भानुप्रिया कंवर, गीतांजलि मरावी
जैसे अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद शामिल हैं। आयोजकों का मानना है कि ऐसे प्रशिक्षण शिविरों से आदिवासी समाज आर्थिक रूप से मजबूत होकर देश की प्रगति में बराबरी से भागीदारी कर सकेगा।
स्थानीय प्रशासन और समाजसेवियों का सहयोग
इस राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर के सफल आयोजन में स्थानीय प्रशासन, ग्रामवासियों और समाजसेवियों का सहयोग भी सराहनीय रहा है। प्रशासन द्वारा आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं, जिससे प्रतिभागियों को आवास, भोजन और प्रशिक्षण में किसी प्रकार की असुविधा न हो।
ग्राम गोंटगवां के लोगों ने भी शिविर के आयोजन में सहयोग कर यह संदेश दिया है कि जब समाज और प्रशासन मिलकर कार्य करते हैं, तो सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
आदिवासी समाज के लिए एक प्रेरणास्रोत
11वां कोया पुनेम राष्ट्रीय आदिवासी प्रशिक्षण शिविर केवल वर्तमान की आवश्यकता नहीं, बल्कि भविष्य की नींव है। यह शिविर आदिवासी युवाओं को यह एहसास कराता है कि वे केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि निर्माता और नेतृत्वकर्ता भी हैं।
आज जब देश आत्मनिर्भर भारत की बात कर रहा है, तब आदिवासी समाज की आत्मनिर्भरता राष्ट्र की आत्मनिर्भरता का अभिन्न हिस्सा है। ऐसे प्रशिक्षण शिविर इस दिशा में मजबूत कदम हैं।
निष्कर्ष
सूरजपुर में आयोजित 11वां कोया पुनेम राष्ट्रीय आदिवासी प्रशिक्षण शिविर 2025 आदिवासी समाज के सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है। यह शिविर न केवल युवाओं को रोजगार और कौशल से जोड़ रहा है, बल्कि उन्हें अपनी संस्कृति, पहचान और आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दे रहा है।
आशा है कि यह चार दिवसीय शिविर आदिवासी युवाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाएगा और भविष्य में ऐसे और भी प्रयासों को जन्म देगा।
Author: Shambhoo Dwip
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