डिहठून / डेठून / जेठोनी पंडुम : जीव-जंतुओं और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का महापर्व 🌾 आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

🌾 डिहठून / डेठून / जेठोनी पंडुम : जीव-जंतुओं और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का महापर्व 🌾

आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

आदिवासी संस्कृति में हर पर्व केवल आनंद या उत्सव नहीं होता, बल्कि वह प्रकृति, जीव-जंतुओं, धरती दाई और पूर्वजों के प्रति आभार का प्रतीक होता है। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है — डिहठून / डेठून / जेठोनी पंडुम, जिसे आदिवासी समाज सदियों से मनाता आ रहा है।

“डिह” का अर्थ है आराध्य स्थान — वह पवित्र जगह जहाँ पूजा-अर्चना की जाती है। “ठून” का अर्थ है जीव-जंतुओं का पवित्र स्थान — वह स्थान जहाँ गाय-बैल, बकरी, मुर्गी आदि को रखा जाता है। इन दोनों शब्दों से मिलकर बना “डिहठून” हमारे जीवन में प्रकृति, पशु और मनुष्य के संबंध की एक गहरी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।

कुछ क्षेत्रों में इसे “डेठून” के नाम से भी जाना जाता है, जो “डिहठून” का ही अपभ्रंश (स्थानीय रूप) है। यह नाम भले अलग हो, लेकिन इसकी भावना, परंपरा और महत्व एक ही है — जीव-जंतुओं और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता।

हमारे समाज में जिस जगह जीव-जंतुओं को बांधा जाता है, उसे कोठा या ठून कहा जाता है, और जिस जगह हम अपने आराध्य देवताओं की पूजा करते हैं, उसे डिह कहा जाता है। यही एक अद्भुत संगम है — जहाँ जीवन और जीविका, दोनों का सम्मान होता है।

“टोला” और “ठून” शब्द गोंडी भाषा से आए हुए हैं, जिनका अर्थ है आश्रित मोहल्ला या परिक्षेत्र — जहाँ लोग, जीव-जंतु और प्रकृति एक साझा जीवन का हिस्सा बनते हैं। जैसे शिक्षा का केंद्र गोटुल होता है, वैसे ही पशुधन का यह पवित्र स्थान डिहठून कहलाता है।

“जेठोनी पंडुम” इसी परंपरा का एक भाग है। धर्मपाल कोडापे के अनुसार, इस दिन गाय-बैलों को नई फसल की खिचड़ी खिलाई जाती है। गांव के लोग “झलिंगं बड़का” जैसे पारंपरिक नृत्य करते हैं, डंडारी नृत्य का आयोजन होता है और इस दिन से कोलांग की शुरुआत मानी जाती है।

यह दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि कृतज्ञता और आत्ममंथन का दिन है। जब समाज के लोग अपने खेतों में उगाए अनाजों — कोहड़ा, लाला कांदा, नकवा कांदा, गैईठ कांदा, गन्ना, फल्ली, सिंघाड़ा आदि — को बैलों और पशुओं को खिलाते हैं, उन्हें माला पहनाते हैं, तो यह हमारे जीव-जंतुओं के प्रति “धन्यवाद ज्ञापन” होता है।

क्योंकि हमारे पूर्वज जानते थे —
👉 “बैल के बिना खेत नहीं, खेत के बिना अनाज नहीं, और अनाज के बिना जीवन नहीं।”

आज का आधुनिक युग मशीनीकरण की ओर बढ़ गया है, लेकिन हमारी जड़ें अभी भी बैलों की टापों में और प्रकृति की गोद में ही बसती हैं। यही कारण है कि डिहठून / डेठून / जेठोनी पंडुम हमें स्मरण कराता है कि —
“हमारी सभ्यता और समृद्धि की नींव हमारे जीव-जंतुओं पर ही टिकी हुई है।”

इस दिन घर का मुखिया अपने जीव-जंतुओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उपवास भी रखता है — यह एक गहरी भावनात्मक परंपरा है, जो बताती है कि हमें उन जीवों की मेहनत का सम्मान करना चाहिए जो हमारे खेतों को जोतते हैं, हमारे जीवन को समृद्ध करते हैं, परंतु स्वयं कभी बोल नहीं पाते।

डिहठून / डेठून / जेठोनी पंडुम केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन दर्शन का मूल मंत्र है —
🌿 “प्रकृति ही पूजा है, जीव-जंतु ही जीवन हैं, और कृतज्ञता ही धर्म है।” 🌿
यह सरगुजा की विचारधारा को लिखा गया है जिसे मैं अपने शब्दों पर लिखा हूं अगर कोई जानकारी आपके पास हो तो बिल्कुल हमें साझा करें हम समझने और लिखने का प्रयास करेंगे
9753734784
लेखक: ✍️ राकेश सांडिल
शंभू शक्ति सेना परिवार की ओर से
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Shambhoo Dwip
Author: Shambhoo Dwip

जोहार शंभू द्वीप न्यूज़ चैनल में आपका स्वागत है गोंडवाना की धरती पर आपकी आवाज .... जिस धरती पर जिसकी पहचान हो ,जिस धरती पर उसका नाम हो, आज वही मूल मालिक अपनी पहचान के लिए दर-दर भटक रहा है, बाहर के लोगों का उनकी संस्कृति पर हमला, इसलिए शंभू द्वीप न्यूज़ चैनल गोंडवाना की धरती पर आपका आवाज... हमें सपोर्ट करें

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