स्थान : विश्व का प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ, कोरबा (छत्तीसगढ़)
दिनांक : 15 नवंबर 2025
कोरबा – धरती आबा बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती आदिवासी शक्तिपीठ कोरबा में ऐतिहासिक गरिमा के साथ मनाई गई

आज दिनांक 15/11/2025 को विश्व के प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ कोरबा में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती अत्यंत हर्ष, उल्लास और सांस्कृतिक गौरव के साथ मनाई गई। इस अवसर पर शक्तिपीठ के सभागार में आयोजित “आदिवासी जनजाति गौरव दिवस” में बड़ी संख्या में समाजजन, युवा, महिलाएं, वरिष्ठजन एवं शंभू शक्ति सेना के पदाधिकारी उपस्थित हुए।
■ छत्तीसगढ़ से शुरू हुई नई परंपरा
“सूरजपुर के गोंडवाना भवन से आदिवासी युवाओं का संदेश — ‘हम अपनी भाषा और संस्कृति खुद बचाएंगे’”
कार्यक्रम में बताया गया कि राज्य में बिरसा मुंडा जयंती को भव्य रैली और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से मनाने की परंपरा की आधिकारिक शुरुआत विश्व के प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ कोरबा से की गई। आज यह आयोजन न केवल प्रदेश में बल्कि पूरे देश में आदिवासी गौरव, संघर्ष और एकता का प्रतीक बन चुका है।
ऐतिहासिक आदिवासी विद्रोहों को किया गया याद
संगोष्ठी में उन सभी स्वाभिमानी आदिवासी योद्धाओं को श्रद्धांजलि दी गई जिन्होंने सन 1766 से 1900 तक मुगल और अंग्रेज साम्राज्य के खिलाफ लगातार वीरतापूर्वक विद्रोह किए।
इन विद्रोहों में मुख्य रूप से —
चुआड़ विद्रोह
संथाल विद्रोह
कोल विद्रोह
हो विद्रोह
तेलंग खड़िया विद्रोह
भूमकाल (गोंड) विद्रोह
मुंडा विद्रोह

इन विद्रोहों ने देश के स्वतंत्रता संघर्ष की नींव रखी, इसलिए इन आदिवासी योद्धाओं को राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के अग्रदूत कहा गया।
हल्दीघाटी के भील योद्धाओं का भी किया गया स्मरण
सभा में राजस्थान मेवाड़ के वीर राणा पूंजा भील और उनकी भील टुकड़ी के अमर योगदान को भी याद किया गया।
सन् 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप की सेना संकट में थी, तब राणा पूंजा भील ने गोरिल्ला युद्ध कौशल से अकबर की सेना के आक्रमण को ध्वस्त कर दिया था। यह आदिवासी पराक्रम का ऐतिहासिक उदाहरण है।

आदिवासी इतिहास — पराक्रम, स्वाभिमान और मानवता का प्रतीक
वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज ने स्वतंत्रता से पहले और स्वतंत्रता के बाद भी अपनी सांस्कृतिक विरासत, जल-जंगल-जमीन और मानवीय मूल्यों की रक्षा हेतु अद्वितीय त्याग किया है।
उनका इतिहास साहस, स्वाभिमान और मानवीय संवेदनाओं से भरा हुआ है।
शुभारंभ — माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन
कार्यक्रम की शुरुआत शक्तिपीठ के संरक्षक श्री मोहन सिंह प्रधान ने बिरसा मुंडा के तैलचित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलित कर की।
संचालन शक्तिपीठ के उपाध्यक्ष श्री निर्मल सिंह राज द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख पदाधिकारी
संरक्षक — श्री रघुवीर मार्को, श्री मोहन प्रधान
उपाध्यक्ष — श्री निर्मल सिंह राज
संगठन प्रमुख — श्री रमेश सिरका
कोषाध्यक्ष — गेंदलाल सिदार
महासचिव — श्री एमपी सिंह तंवर
पुजारी – राम चरण गोंड जी
महिला प्रभाग प्रमुख — श्रीमती कृष्णा राजेश, श्रीमती सुनीता सिरका,
अगरिया समाज प्रमुख तथा शंभू शक्ति सेना के सभी पदाधिकारी
श्री मोहन प्रधान जी, निर्मल सिंह राज जी, रमेश सिरका, एम पी तंवर जी,
शंभू शक्ति सेना द्वारा विशेष आयोजन
शंभू शक्ति सेना कोरबा इकाई ने भी बिरसा मुंडा जयंती पर विशेष कार्यक्रम आयोजित कर उनके त्याग और संघर्ष को नमन किया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा —
बिरसा मुंडा की लड़ाई जल, जंगल, जमीन और मातृभूमि बचाने की लड़ाई थी।
25 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दे दी थी।
“आबुआ दिसुम – आबुआ राज” का नारा देकर उन्होंने आदिवासी अस्मिता को जगाया।

शंभू शक्ति सेना ने कहा कि आज आदिवासी समाज की माटी, बेटी और जमीन पर लगातार आक्रमण हो रहे हैं, परंतु समाज छोटे-छोटे हिस्सों में बंटकर संघर्ष कर रहा है।
इसलिए एकता ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
■ संगठन की “चार शपथ” में मुख्य शपथ —

“जल-जंगल-जमीन की अंतिम सांस तक रक्षा करेंगे।”
साथ ही जातिवाद, क्षेत्रीयतावाद और विभाजनकारी प्रवृत्तियों को त्यागकर एक मजबूत समाज बनाने का संकल्प भी दोहराया गया।
उपस्थित प्रमुख सदस्य
सुनीता सिरका,सिंधु नेताम,संतोषी कंवर,राधिका,वीरेंद्र राठिया (ब्लॉक अध्यक्ष, शंभू शक्ति सेना कोरबा)
सुनील राठिया ,भानु श्याम,रमेश सिरका,अगरिया समाज प्रमुख
तथा शंभू शक्ति सेना के अन्य सभी सदस्य एवं सहयोगी उपस्थित रहे।
मार्को सर
समापन
कार्यक्रम का समापन धरती आबा बिरसा मुंडा के सपनों को साकार करने, आदिवासी संस्कृति रक्षा, जल-जंगल-जमीन संरक्षण और समाज की एकजुटता के संकल्प के साथ किया गया।
पूरे आयोजन में गौरव, एकता और उत्साह का अद्भुत वातावरण रहा।
Author: Shambhoo Dwip
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