हिड़मा का एन्काउंटर फर्जी?—पूर्व विधायक कुंजाम का बड़ा धमाका!

 

हिड़मा : जंगल का बेटा, संघर्ष का प्रतीक और रक्तबीज की कहानी

— आदिवासी दृष्टिकोण से एक विस्तृत लेख….

 प्रस्तावना

छत्तीसगढ़ (बस्तर) के घने जंगलों में जन्मा हिड़मा केवल एक नाम नहीं था; वह उन जंगलों की सांसों की तरह जीवित था।
शासन–प्रशासन की नजर में वह “नक्सली” था, पर स्थानीय आदिवासी समाज के लिए वह जंगल का रक्षक, अपनी मिट्टी का प्रहरी, और कई लोगों की नजर में भगवान जैसा संरक्षक था।

कहते हैं—
“जंगल बचा है तो इसलिए, क्योंकि जंगल का बेटा हिड़मा अभी तक खड़ा था।”
लेकिन आज हिड़मा नहीं है…
और इससे बड़ा सवाल यह है—
क्या अब जंगल बचेगा? क्या उसके लोग बचेंगे?


1. हिड़मा—जंगल बचाने की सोच लेकर निकला एक आदिवासी युवा

हिड़मा का जीवन एक सरल आदिवासी युवक की कहानी थी।
वह हथियार लेकर पैदा नहीं हुआ था;
वह तो सिर्फ जंगल, प्रकृति, परंपरा और अपनी धरती को बचाने की भावना लेकर निकला था।

लेकिन बस्तर के हालात ने उसे दूसरी राह पर धकेल दिया—
जहाँ बंदूक थी, संघर्ष था, और जीवन की हर सांस मौत की आग में तपती थी।

पूर्व विधायक मनीष जी का आरोप एवं उनका न्यूज़ अंत में पढ़ें

शासन की नजर में वह अपराधी था,
लेकिन आम आदिवासी जनता के लिए वह अपने हक–अधिकार की ढाल था।


 2. हिड़मा — जंगल का रक्तबीज

बस्तर के आदिवासियों में एक कहावत चलती है:
“रक्तबीज मरते नहीं;
उनका एक रक्तकण भी धरती छू ले, तो सौ नए जन्म लेते हैं।”

इसीलिए लोग कहते हैं—

मरते नहीं हिड़मा
कोई मार नहीं सकता हिड़मा को
हिड़मा रक्तबीज है
जहां उसका रक्त गिरता है
वहां नए बीज अंकुरित होते हैं
और एक दिन
वही बीज विशाल वटवृक्ष बनते हैं…

यह सिर्फ कविता नहीं,
आदिवासी इतिहास का सच है।


 3. इतिहास गवाह है — तिलका से लेकर बिरसा तक सभी को दमन का सामना करना पड़ा

तिलका मांझी को दिकुओं ने फांसी पर चढ़ाया,
सोचा—अब खत्म हो गया विद्रोह।
लेकिन तिलका के रक्त से
बिरसा मुंडा,
फिर टंट्या भील,
फिर वीर गुंडाधुर
जैसे योद्धा पैदा हुए।

यही इतिहास कहता है—
जहाँ आदिवासियों का रक्त बहता है
वहाँ प्रतिरोध की नई कथा जन्म लेती है।


 4. हिड़मा की मृत्यु — एक कहानी का अंत, पर संघर्ष का नहीं

हिड़मा और उनकी पत्नी को एक ही चिता में जलाया गया।
भीड़ इतनी थी कि देखने वालों की सांसें रुक गईं।
जिन्होंने कभी उसे “भगवान” कहा था,
वे आज रोते हुए उसके अंतिम संस्कार में खड़े थे।

लेकिन दर्द इससे भी बड़ा है—
क्या वह असली दोषी मारा गया?
या
वे लोग अब भी जीवित हैं जिन्होंने उसे नक्सली बनाया?


5. किसने बनाया हिड़मा को “नक्सली”?

इसका उत्तर गहरा है।
बस्तर का इतिहास बताता है—

  • भोले–भाले युवाओं को
    माइंड वॉश कर संघर्ष की राह पर धकेला गया।
  • और दूसरी ओर
    आदिवासी युवाओं को
    “देशभक्ति” के नाम पर फ़ोर्स में भर्ती किया गया
    ताकि वे अपने ही भाइयों से लड़ें

परिणाम—
गोलियाँ किस भी तरफ से चली, मरा सिर्फ बस्तर का आदिवासी ही।

यही बस्तर का सबसे बड़ा दुःख है।


 6. बस्तर में असली युद्ध — नक्सल बनाम सैनिक नहीं,

बल्कि आदिवासी बनाम आदिवासी**
आज स्थिति यह है कि—

  • एक ओर जंगल का आदिवासी युवक नक्सली बनाकर भेजा जाता है
  • दूसरी ओर उसी समुदाय का युवक फ़ोर्स में भर्ती कर दिया जाता है

दोनों हाथों में बंदूक थमाकर कहा जाता है—
“लड़ो! मरो! मराओ!”

इस आग में
न जंगल बचा,
न संस्कृति,
न ही आदिवासी समाज।


 7. अगर यह नरसंहार नहीं रुका…

अगर वर्तमान व्यवस्था ऐसे ही चलती रही
तो एक दिन बस्तर से आदिवासी खत्म हो जाएगा
लेकिन नक्सलवाद खत्म नहीं होगा,
क्योंकि—

नक्सलवाद एक विचारधारा है,
विचारधाराएँ मरती नहीं,
मरते हैं उन्हें मानने वाले लोग।


 8. हिड़मा की हत्या — एक धोखे की कहानी

जैसे बस्तर के अंतिम राजा प्रवीण चंद्र भंजदेव को धोखे से मारा गया,
वैसे ही हिड़मा को भी।

उन पहाड़ों को,
उन घाटियों को—
जिन्हें 25 हजार सैनिकों की सेना नहीं जीत सकी,
उन्हें रुपयों के लालच में दिए गए मुखबिरी ने जीत लिया।

यह आदिवासी इतिहास की सबसे पुरानी त्रासदी है—
धोखा।


 9. निष्कर्ष — हिड़मा मर गया, लेकिन हिड़मा का विचार नहीं

हिड़मा की मृत्यु एक घटना है,
लेकिन इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।

  • सामाजिक अन्याय
  • जंगलों का दोहन
  • आदिवासियों का विस्थापन
  • शोषण का इतिहास
  • विकास का अभाव

जब तक ये जिंदा हैं,
हिड़मा जैसे संघर्षकारी भी जन्म लेते रहेंगे।

जंगल का बेटा अब नहीं रहा,
लेकिन
जंगल की आत्मा अब भी उसी मिट्टी में सांस ले रही है।


 क्रांतिकारी सेवा जोहार…

हिड़मा और उसकी संगिनी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि।*

📌 हिड़मा की मौत पर सियासी बवाल तेज — पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने मुठभेड़ को बताया फर्जी, लगाया बड़ा आरोप

 

सुकमा/छत्तीसगढ़।

माओवादी कमांडर माड़वी हिड़मा के मारे जाने के बाद बस्तर में राजनीतिक बयानबाज़ी तेज हो गई है। एक ओर सुरक्षा एजेंसियाँ इसे बड़ी उपलब्धि बता रही हैं, तो दूसरी ओर आदिवासी समाज के कई नेता लगातार सवाल उठा रहे हैं।

 

इसी बीच पूर्व विधायक और वरिष्ठ आदिवासी नेता मनीष कुंजाम ने हिड़मा की मौत को लेकर बड़ा दावा किया है। कुंजाम ने कहा कि—

“यह मुठभेड़ फर्जी है, हिड़मा को प्लान बनाकर मारा गया है।”

 

🔍 मनीष कुंजाम का आरोप — “देवजी ने रची साजिश, मुठभेड़ का रूप दिया गया”

अपने बयान में मनीष कुंजाम ने आरोप लगाया कि—

हिड़मा को मारने की पूरी साजिश स्थानीय स्तर पर रची गई, और बाद में इसे एन्काउंटर का रूप दिया गया, इसमें “देवजी” की भूमिका होने का सीधा आरोप उन्होंने लगाया है। कुंजाम ने कहा कि हिड़मा की मौत अचानक हुई घटना नहीं है, बल्कि कई दिनों की प्लानिंग और धोखे का परिणाम है।🔥 हिड़मा की मौत के बाद बस्तर में बढ़ी हलचल

हिड़मा की मौत के बाद लगातार दो धाराएं सामने आ रही हैं— Instagram link 🖇️

https://www.instagram.com/reel/DRWRwwjCAeX/?igsh=c3pxanVqNzd5a3Fj

1️⃣ शासन–प्रशासन का दावा

हिड़मा टॉप माओवादी लीडर था

उसकी मौत सुरक्षा बलों की बड़ी सफलता है

बस्तर में नक्सल गतिविधियों पर इसका असर पड़ेगा

2️⃣ स्थानीय समाज और आदिवासी नेताओं की प्रतिक्रिया

हिड़मा को कई गांवों में जंगल का रक्षक माना जाता था

कहा जा रहा है कि उसे विश्वासघात और मुखबिरी के कारण मारा गया

लोग यह भी सवाल कर रहे हैं कि

क्या असली दोषी मारा गया, या सिर्फ एक मोहरा?

आदिवासी दृष्टिकोण— “जंगल का बेटा धोखे से मारा गया”

कई स्थानीय लोग मानते हैं कि—

हिड़मा शासन की नजर में भले नक्सली था,

पर आदिवासी जनता की नजर में वह था—

जंगल बचाने वाला

अपनी जमीन का पहरेदार

और दिकुओं से सदियों से चल रहे संघर्ष का प्रतीक

यही कारण है कि उसकी मौत के बाद इतनी बड़ी भीड़ अंतिम संस्कार में उमड़ी, और यह सवाल उठने लगे कि “क्या सच में मुठभेड़ हुआ था?”

राजनीतिक टकराव और नए सवाल

कुंजाम के आरोपों ने बस्तर की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

अब सवाल उठ रहे हैं—

क्या हिड़मा की पहचान पहले ही कर ली गई थी?

क्या उसे पकड़ने के बजाय मारने का निर्णय लिया गया?

क्या यह अभियान राजनीतिक दबाव में चलाया गया?

क्या यह मुठभेड़ सच में हुई थी या पहले से तय घटना थी?

इन सवालों के जवाब अभी तक सामने नहीं आए हैं।

🛑 क्या है सच?

सच क्या है, यह आने वाले दिनों में जांच और परिस्थितियाँ ही बताएंगी।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि—

 

हिड़मा की मौत सिर्फ एक घटना नहीं,

यह बस्तर की सामाजिक–राजनीतिक धरातल को हिला देने वाली घटना है।

 

आदिवासी नेतृत्व और शासन–प्रशासन के बीच अविश्वास और बढ़ गया है।

 

और मनीष कुंजाम के आरोपों ने इस मामले को और विवादित बना दिया है।

 

📌 निष्कर्ष

 

हिड़मा की मौत पर उठ रहे सवालों ने बस्तर में नई बहस छेड़ दी है।

सुरक्षा बलों की उपलब्धि और राजनीतिक आरोपों के बीच फंसा है आदिवासी समाज, जो आज भी यही पूछ रहा है—

 

“क्या है सच

Shambhoo Dwip
Author: Shambhoo Dwip

जोहार शंभू द्वीप न्यूज़ चैनल में आपका स्वागत है गोंडवाना की धरती पर आपकी आवाज .... जिस धरती पर जिसकी पहचान हो ,जिस धरती पर उसका नाम हो, आज वही मूल मालिक अपनी पहचान के लिए दर-दर भटक रहा है, बाहर के लोगों का उनकी संस्कृति पर हमला, इसलिए शंभू द्वीप न्यूज़ चैनल गोंडवाना की धरती पर आपका आवाज... हमें सपोर्ट करें

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