रावण दहन पर आदिवासी प्रतीक “सिंगमोहर (कोकट्टा)” लगाने का विरोध, शंभू शक्ति सेना के युवाओं ने जताई आपत्ति
गढ़ उपरोढा कोरबा – 2 अक्टूबर 2025
दशहरे के अवसर पर पूरे देश में परंपरा अनुसार रावण दहन कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में विभिन्न स्थानों से सोशल मीडिया पर तस्वीरें सामने आईं, जिनमें रावण के पुतले के साथ आदिवासी सांस्कृतिक प्रतीक सिंगमोहर (गोंडी भाषा में “कोकट्टा”) लगाए जाने की जानकारी मिली।
इस सूचना पर शंभू शक्ति सेना के युवाओं ने तत्काल संज्ञान लिया और संबंधित आयोजन समितियों से संपर्क साधकर इस पर आपत्ति जताई। युवाओं ने आयोजनकर्ताओं को बताया कि सिंगमोहर (कोकट्टा) आदिवासी समाज की गहरी आस्था और सांस्कृतिक प्रतीक है, जिसका किसी भी बुराई या असत्य के प्रतीक से जोड़ना अनुचित है।
आयोजन समितियों ने मानी गलती
युवाओं के आग्रह और समझाइश के बाद आयोजन समितियों ने स्वीकार किया कि यह कार्य अज्ञानतावश पुतला बनाने वालों के द्वारा किया गया था। जानकारी मिलने पर तुरंत पुतलों से कोकट्टा हटाया गया और भविष्य में इस तरह की गलती न दोहराने का आश्वासन भी दिया गया।
क्या है सिंगमोहर (कोकट्टा) का महत्व?
- गोंडी भाषा में “कोकट्टा” का अर्थ:
- “को” = कोया पुनेम, कोयतोर, कोयामुरी जैसे पवित्र शब्द।
- “कट्टा” = पेन कड़ाओ (देवताओं का समूह) या समुदाय की एकजुटता।
- सांस्कृतिक प्रतीक:
कोकट्टा आदिवासी नृत्य, पेन करसाड़, और धार्मिक परंपराओं का मुख्य आधार है। जब कोया पुनेमी नृत्य करते हैं तो वे कहते हैं – “कोया ना डाका… कोकट्टा डाका” यानी कोया पुनेमियों के कदम कोकट्टा जैसे हों।
यह प्रतीक न केवल नृत्य और परंपरा का हिस्सा है बल्कि गोंडवाना की सामुदायिक भावना और अनुशासन का प्रतीक भी है। - इतिहास और परंपरा:
कोकट्टा का धारण करना महान लिंगों गुरुओं द्वारा स्थापित परंपरा है, जो समाज को एकजुटता, नियम और संस्कृति का संदेश देता है।
आदिवासी समाज की आपत्ति क्यों?
पिछले कुछ समय से देखा जा रहा है कि विभिन्न धार्मिक आयोजनों, चुनावी रैलियों और सार्वजनिक मंचों पर आदिवासी समाज से जुड़े प्रतीकों का गलत प्रयोग हो रहा है।
युवाओं का कहना है कि – 
- इस तरह की हरकतें आदिवासी समाज की मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान पर हमला हैं।
- यदि इसे नहीं रोका गया तो इसके गंभीर सामाजिक और सांस्कृतिक दुष्परिणाम भविष्य में सामने आएंगे।

शंभू शक्ति सेना का संदेश
युवाओं ने स्पष्ट कहा कि –
“आदिवासी प्रतीक हमारी आस्था और संस्कृति से जुड़े हैं, इन्हें किसी भी तरह अपमानित या गलत अर्थों में नहीं जोड़ा जा सकता। समाज को जागरूक रहना होगा और इस तरह की गतिविधियों का विरोध करना होगा।”
Author: Shambhoo Dwip
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