नई दिल्ली। संसद के हालिया सत्र में विदेश नीति और अमेरिका के हस्तक्षेप पर बहस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह का बयान—”हिंदू कभी आतंकी नहीं हो सकता”—गंभीर राजनीतिक और सामाजिक बहस का मुद्दा बन गया है। लेखक के अनुसार यह बयान केवल विपक्ष के सवालों से बचने की रणनीति नहीं, बल्कि असफलताओं को छुपाने और ‘हिंदू खतरे में है’ जैसे पुराने राजनीतिक हथियार को फिर से तेज़ करने का प्रयास है।
लेख में दावा किया गया है कि आतंकवाद किसी धर्म का मोहताज नहीं होता, बल्कि यह एक सुनियोजित वैचारिक और राजनीतिक परियोजना के तहत तैयार किया गया हिंसा का तंत्र है। गांधीजी की हत्या, मालेगांव बम धमाके, समझौता एक्सप्रेस विस्फोट, कर्नाटक ज़हरकांड, संघ के अंदरूनी खून-खराबे और कई अन्य घटनाओं के उदाहरण देते हुए लेखक ने सवाल उठाया कि क्या इन सभी मामलों में धर्म का नाम ढाल बनकर इस्तेमाल नहीं किया गया?
लेख के मुताबिक अदालतों में सबूत के अभाव में कई संगठित हिंसक मामलों के आरोपी बरी हो रहे हैं, जबकि समाज में नफरत फैलाने और असहमत आवाज़ों को दबाने का सिलसिला जारी है। बाबरी विध्वंस से लेकर सांप्रदायिक हिंसा तक, धर्म की आड़ में की जाने वाली इन कार्रवाइयों को लेखक ने ‘हिंदुत्ववादी आतंक’ की परिभाषा में रखा है, जो स्वघोषित नास्तिक सावरकर द्वारा गढ़े गए शब्द ‘हिंदुत्व’ के राजनीतिक और आर्थिक एजेंडे का हिस्सा है।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण देते हुए म्यांमार में रोहिंग्या नरसंहार का हवाला दिया गया है, जहां बौद्ध धर्म के नाम पर हिंसा की गई, जबकि बौद्ध धर्म का मूल सिद्धांत अहिंसा है। लेखक का कहना है कि यही पैटर्न भारत में भी अपनाया जा रहा है—नकली दुश्मन गढ़ना, धर्म और नस्ल के खत्म होने का डर फैलाना और सत्ता को स्थायी करने के लिए साम्प्रदायिक माहौल बनाना।
लेख का निष्कर्ष साफ है—आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन धर्म की आड़ में छुपने और उसे बदनाम करने वाले असल में अपने ही धर्म के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
(लेखक ‘लोकजतन’ के सम्पादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94242-31650)
Author: Shambhoo Dwip
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