भारतीय ज्ञान प्रणाली के नाम पर संघी दर्शन को पढ़ाने और वर्णाश्रमी समाज बनाने की योजना का खुलासा
दिल्ली – नई शिक्षा नीति-2020 और हालिया सरकारी निर्णयों के जरिए केंद्र सरकार ने शोध और उच्च शिक्षा में गहरी वैचारिक घुसपैठ शुरू कर दी है। पीएचडी प्रवेश के लिए नेट स्कोर अनिवार्य करके गरीब, दलित, आदिवासी और वंचित वर्ग के छात्रों की राह मुश्किल कर दी गई है, जबकि दूसरी ओर “सेतुबंध विद्वान योजना” के तहत गुरुकुल शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को आईआईटी में बिना जेईई स्कोर के प्रवेश और 65,000 रुपये मासिक फेलोशिप का तोहफ़ा दिया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह शिक्षा में दोहरा मापदंड है — एक ओर वैज्ञानिक सोच और आधुनिक अकादमिक मेहनत करने वालों के लिए नई दीवारें खड़ी की जा रही हैं, दूसरी ओर वैदिक शास्त्रों के नाम पर एक खास तबके को विशेषाधिकार दिए जा रहे हैं। इससे न केवल अनुसंधान का स्तर गिरने का खतरा है, बल्कि शिक्षा में जातिगत वर्चस्व की वापसी भी तय मानी जा रही है।

इतिहासकार और शिक्षा विश्लेषकों का मानना है कि “भारतीय ज्ञान प्रणाली” के बहाने आरएसएस और भाजपा सरकार एक मनुवादी ढांचे की तरफ देश को मोड़ रही है। संविधान में निहित वैज्ञानिक सोच और समानता के मूल्यों को दरकिनार कर, शिक्षा को एक वैचारिक हथियार में बदला जा रहा है, जो लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए गंभीर खतरा है।
लेख में साफ कहा गया है कि अगर यह साजिश समय रहते न रोकी गई, तो आने वाले वर्षों में शिक्षा तंत्र पूरी तरह से वर्णाश्रम आधारित और तर्कहीन सोच को पोषित करने वाला हो जाएगा, जिससे देश के वैज्ञानिक, औद्योगिक और सामाजिक विकास पर गहरा नकारात्मक असर पड़ेगा।
(रिपोर्ट – जी. रामकृष्णन / अनुवाद – संजय पराते)
Author: Shambhoo Dwip
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