**वीरांगना महारानी दुर्गावती बलिदान दिवस पर विशेष — गोंडवाना की अमर गौरवगाथा**
**”गोंडवाना की महारानी दुर्गावती जैसी पराक्रमी नारी न तो किसी युग में हुई और न ही भविष्य में होगी”**
भारत के मध्य प्रदेश में स्थित गोंडवाना साम्राज्य की वीरांगना महारानी दुर्गावती का नाम भारतीय इतिहास के स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उनकी वीरता, शौर्य, बुद्धिमत्ता और प्रशासनिक कुशलता की मिसाल विश्व इतिहास में विरले ही देखने को मिलती है। 24 जून 1564 का दिन गोंडवाना की मातृशक्ति की वीरता की वह तारीख है जब उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर मातृभूमि की अस्मिता की रक्षा की थी।
### **गोंडवाना साम्राज्य और संग्राम शाह का गौरवशाली इतिहास**
गोंडवाना राज्य का विस्तार मध्य भारत के भोपाल से लेकर विशाखापट्टनम तक फैला था, जिसे *गढ़ा कटंगा* या *मंडला राज्य* के नाम से जाना जाता था। इस साम्राज्य की स्थापना 169 ईस्वी में *यदुराय मरावी* द्वारा हुई और 1779 ईस्वी तक इसका शासन रहा। इस राजवंश के महान सम्राट *संग्राम शाह* ने 1478 में सत्ता संभाली और 52 गढ़ों को जीतकर एक अजेय साम्राज्य खड़ा किया।
उनकी शक्ति और प्रशासनिक कौशल से दिल्ली के सुलतान *इब्राहिम लोदी* तक भयभीत रहते थे। संग्राम शाह और लोदी वंश की मित्रता इतनी सुदृढ़ थी कि राजपूताना के राजा भी उनकी ओर आंख उठाकर नहीं देख सकते थे।
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### **महारानी दुर्गावती का जन्म और बाल्यकाल**
महारानी दुर्गावती का जन्म नरसिंहपुर जिले के एक प्रतिष्ठित *उइके राजवंश* में हुआ था। उनका कुलदेवता “बाघ” था, जो उनके भीतर जन्मजात साहस और शौर्य का प्रतीक बना। बचपन से ही वे घुड़सवारी, तीरंदाजी, तलवारबाजी जैसी युद्ध कलाओं में पारंगत हो गई थीं। उन्हें नर्मदा नदी में तैराकी का भी गहरा अभ्यास था।
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### **राजकुमार दलपत शाह से विवाह और गोंडवाना की महारानी बनना**
गोंडवाना सम्राट *संग्राम शाह* के पुत्र *दलपत शाह* जब नरसिंहपुर क्षेत्र में शिकार के दौरान दुर्गावती के युद्ध कौशल और सौंदर्य से प्रभावित हुए, तो विवाह का प्रस्ताव रखा गया। यह विवाह *सिंगौरगढ़* में सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद संग्राम शाह ने बहू दुर्गावती को सिंगौरगढ़ का किला भेंट स्वरूप दिया।
मात्र एक वर्ष में महारानी दुर्गावती ने राज्य प्रशासन, सैन्य संचालन, और वित्तीय व्यवस्था का गहन अध्ययन कर राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
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### **साम्राज्ञी, योद्धा और न्यायप्रिय प्रशासक**
महारानी दुर्गावती अद्वितीय प्रशासक थीं। वे दो तलवारों से युद्ध कर सकती थीं और युद्ध में हाथियों के संचालन में भी निपुण थीं। उनके शासकीय कार्य इतने प्रभावशाली थे कि अंग्रेज इतिहासकार स्मिथ ने लिखा— *“प्रजा को कभी नहीं लगा कि सम्राट संग्राम शाह और दलपत शाह इस संसार में नहीं हैं।”*
उनके राज में शेरों के शिकार पर प्रतिबंध था, जिससे आज भी मंडला–बालाघाट क्षेत्र बाघों की शरणस्थली बना हुआ है।
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### **मुगल आक्रांताओं से संघर्ष और बलिदान**
दलपत शाह की मृत्यु के बाद महारानी ने अपने पुत्र *वीर नारायण सिंह* को चौरागढ़ का किल्लेदार बनाकर स्वयं शासन की जिम्मेदारी संभाली। दिल्ली के शासक अकबर के सेनापति *आसफ खां* ने गोंडवाना पर आक्रमण किया। महारानी ने तीन बार उसे पराजित किया, परंतु 24 जून 1564 को *नरई नाला* के युद्ध में भारी वर्षा के कारण वे केवल 50 सैनिकों के साथ रह गईं। 18,000 मुगल सैनिकों से घिरी महारानी ने युद्ध किया और अंत में अपने सीने में कटार घोंपकर आत्मबलिदान दे दिया।
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### **महारानी दुर्गावती की अमर गाथा**
इतिहासकार डब्ल्यू.एच. सलीमैन ने कहा— *”गोंडवाना की महारानी दुर्गावती ने जिस तरह से राज्य चलाया, वैसा उदाहरण भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं मिलता।”*
1909 का जबलपुर गजेटियर भी यह मानता है कि *“इस पृथ्वी पर इससे पूर्व ऐसी वीरांगना का जन्म नहीं हुआ।”*
उनकी समाधि पर आज भी पत्थर चढ़ाए जाते हैं, और जनश्रुति है—
**“ठांव बाहा खा सब थावे हैं, उनका चौरा।
हाथ जोड़त होए फरकत लगबे खौरा।”**
अर्थात उनकी समाधि पर पत्थर भी उनके शौर्य से फड़क उठते हैं।
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### **बलिदान दिवस की प्रेरणा**
24 जून केवल एक तिथि नहीं, बल्कि मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान की अमरगाथा है। महारानी दुर्गावती का बलिदान हमें यह सिखाता है कि मातृभूमि की रक्षा के लिए एक नारी भी शेरनी बन सकती है।
गोंडवाना का नाम महारानी दुर्गावती के बलिदान से आज भी अमर है — और यह गाथा आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।
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**जय गोंडवाना!
जय वीरांगना दुर्गावती!**
Author: Shambhoo Dwip
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