आचार्य तिरु मोतीरावण कंगाली: गोंडवाना संस्कृति और भाषा के पुनर्जागरणकर्ता

 

परिचय

आदिवासी समाज और गोंडवाना संस्कृति के एक अप्रतिम पुरोधा, *आचार्य तिरु मोतीरावण कंगाली* जी का जन्म 2 फरवरी 1949 को महाराष्ट्र राज्य के नागपुर जिले की रामटेक तहसील के दुलारा ग्राम में हुआ था। वे टिरकाजी कंगाली के वंशज और दाऊ छतीराम एवं दाई रायतार की संतान थे। 30 अक्टूबर 2015 को हृदयाघात के कारण नागपुर में उनका निधन हो गया। उनका जीवन एक समर्पित साधक की तरह रहा, जो गोंडी भाषा, संस्कृति, इतिहास और दर्शन को वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक आधार प्रदान करता है।

 

शिक्षा एवं बौद्धिक साधना

कंगाली जी की प्रारंभिक शिक्षा *प्राथमिक शाला करवाही* में हुई। माध्यमिक शिक्षा उन्होंने *आंग्ल पूर्व माध्यमिक शाला बोथिया-पालोरा* से प्राप्त की, मैट्रिक की पढ़ाई *हड़स हाईस्कूल नागपुर* में पूरी की। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने *धरमपेठ महाविद्यालय नागपुर* से स्नातक और *नागपुर विश्वविद्यालय* के *पोस्ट ग्रेजुएट टीचिंग डिपार्टमेंट* से समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र एवं भाषाशास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्रियाँ प्राप्त कीं।

 

उन्होंने अपनी शोध परियोजना *”The Philosophical Base of Tribal Cultural Values Particularly in Respect of Gond Tribe of Central India“* के तहत गहन अध्ययन किया और “पारी कुपार लिंगो गोंडी पुनेम दर्शन” जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ को लिपिबद्ध किया।

भाषा, साहित्य एवं शोध कार्य

कंगाली जी ने गोंडी भाषा के पुनरुद्धार हेतु जो कार्य किए, वे ऐतिहासिक हैं। उन्होंने न केवल गोंडी भाषा का व्याकरण रचा, बल्कि उसके शब्दकोश भी तैयार किए, जो इस प्रकार हैं:

 

* गोंडी भाषा शब्दकोष भाग-1 एवं भाग-2

* बृहत हिंदी-गोंडी शब्दकोश

* मराठी-गोंडी शब्दकोश

* गोंडी भाषा सीखिए

* गोंडी व्याकरण

* गोंडी लम्क पुंदान

 

उन्होंने गोंडी लिपि पर शोध कर सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों पर अंकित चित्रलिपि का अध्ययन कर “सैंघवी लिपि का गोंडी में उद्घाटन” प्रस्तुत किया।

 

संस्कृति, इतिहास एवं लोकधरोहर पर योगदान

कंगाली जी का लेखन कार्य केवल भाषा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने गोंडवाना के सांस्कृतिक इतिहास, धार्मिक दर्शन और पुरातात्त्विक धरोहरों पर भी व्यापक कार्य किया:

 

* गोंडवाना गढ़ दर्शन

* गोंडवाना कोट दर्शन

* गोंडवाना का सांस्कृतिक इतिहास

* गोंडों का मूलनिवास स्थल परिचय

* गोंडी नृत्य का पूर्वेतिहास

* कोराड़ी गढ़ की तिलका दाई

* डोंगरगढ़ की बम्लाई दाई

* चांदागढ़ की महाकाली कली कंगाली

* बस्तर की दंतेवाड़ीन वेनदाई दंतेश्वरी

 

साथ ही, उन्होंने गोंडी लोककथाओं, श्लोकों, पौराणिक आख्यानों और आदिवासी दर्शन को लिपिबद्ध कर अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का कार्य किया।

 

 

अनंत प्रेरणा के स्त्रोत

आचार्य मोतीरावण कंगाली जी का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए पथप्रदर्शक रहेगा। उन्होंने जो कार्य गोंडी समाज के लिए किए, वह किसी आंदोलन से कम नहीं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि गोंडवाना की संस्कृति, भाषा और इतिहास को न केवल संरक्षित किया जा सकता है, बल्कि आधुनिक विमर्श का हिस्सा भी बनाया जा सकता है।

 

उनकी लेखनी और विचारधारा समाज को आत्मगौरव, सांस्कृतिक जागरूकता और ज्ञान की ओर प्रेरित करती रहेगी।

 

 

नमन और श्रद्धांजलि

गोंडवाना के महान तपस्वी, भाषा-धर्म और संस्कृति के प्रहरी आचार्य तिरु मोतीरावण कंगाली को भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

 

 

Shambhoo Dwip
Author: Shambhoo Dwip

जोहार शंभू द्वीप न्यूज़ चैनल में आपका स्वागत है गोंडवाना की धरती पर आपकी आवाज .... जिस धरती पर जिसकी पहचान हो ,जिस धरती पर उसका नाम हो, आज वही मूल मालिक अपनी पहचान के लिए दर-दर भटक रहा है, बाहर के लोगों का उनकी संस्कृति पर हमला, इसलिए शंभू द्वीप न्यूज़ चैनल गोंडवाना की धरती पर आपका आवाज... हमें सपोर्ट करें

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