#सूरजपुर
#### पृष्ठभूमि
आज मुझे कुछ लिखने का मन किया बहुत दिन से सोच रहा था अपने में जो कमी है उस पर भी जोर देकर उन शब्दों को संलग्न करूं जिसकी वजह से आज सामाजिक एकता में कमी देख रहा हूं मैं कोई शायर तो नहीं और ना ही कोई लेखक हूं अच्छा लगे तो उन गद्दारों तक मैसेज को जरूर पहुंचाएं जो समाज का दिमक बने हुए हैं
खैर हम अपने विचारों को लिखते हैं और आप पूरे अंत तक जरूर पढ़िए तभी समझ में आएगा
जय सेवा। जय आदिवासी। जय गोंडवाना
रानी दुर्गावती मंडावी जी, जिन्हें उनकी वीरता और बलिदान के लिए जाना जाता है, का बलिदान दिवस 24 जून को मनाया गया। यह दिवस आदिवासी समुदाय के लिए विशेष महत्त्व रखता है। हालांकि, इस वर्ष का आयोजन केवल नाम मात्र का ही रह गया, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या आदिवासी समाज में जागरूकता की कमी है। हमने कई जगह का न्यूज़ कवरेज किया और अपने वेब पोर्टल पर भी इस बलिदान दिवस को जगह दी, लेकिन सभी जगह पर 50 की संख्या भी पूरी नहीं हो पाई। सबसे ज्यादा युवाओं की कमी देखने को मिली। यदि आज की युवा पीढ़ी अपने इतिहास और समाज से दूरी बना रही है, तो यह समाज के लिए सबसे बड़ी कमजोरी और बाधा है।

#### आदिवासी समाज में जागरूकता की कमी
सरगुजा संभाग, जो आदिवासी समुदाय की एक बड़ी आबादी का घर है, में यह देखने को मिला कि बहुत कम लोग इस दिवस पर एकत्रित हुए। यह दर्शाता है कि समाज में इतिहास और एकता के प्रति रुचि की कमी है। इसके कई कारण हो सकते हैं:
1. **शिक्षा और जागरूकता की कमी**: आदिवासी इलाकों में शिक्षा का स्तर निम्न है, जिससे समाज के लोगों में अपने इतिहास और महापुरुषों के बारे में जानकारी का अभाव है। लोग आज भी ना गोंडवाना सतरंगी ध्वज के बारे में जानते हैं और ना ही आदिवासी समुदाय में कितने समुदाय आते हैं, यह भी मालूम नहीं है। आदिवासी विकास के नाम पर हमारा विनाश ही होता दिख रहा है।
2. **आर्थिक कठिनाइयाँ**: कई आदिवासी समुदाय आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, जिससे वे अपने दैनिक जीवन की चुनौतियों में उलझे रहते हैं और सामुदायिक आयोजनों में भाग लेने में सक्षम नहीं होते। हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधि बाहरी लोगों के प्रभाव में आकर अपनी ही समाज को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे आदिवासी समाज का आर्थिक विकास रुक गया है। आर्थिक विकास के बिना हम किसी भी क्षेत्र में विकास नहीं कर सकते।
3. **सामाजिक एकता का अभाव**: समाज में एकता की कमी होने के कारण बड़े आयोजनों में सामूहिक भागीदारी नहीं हो पाती। यह कमी बाहरी प्रभावों और आंतरिक मतभेदों के कारण हो सकती है। आदिवासी समुदाय के भीतर धार्मिक क्रियाकलापों और बाहरी विचारधाराओं के प्रभाव से मतभेद होते रहते हैं, जिससे सामाजिक एकता कमजोर हो जाती है। जब तक एकता नहीं होगी, तब तक वह शक्ति नहीं दिखेगी, जिससे हमारा खोया हुआ मान-सम्मान वापस मिल सके।
#### जल, जंगल, जमीन का मुद्दा
जल, जंगल, और जमीन आदिवासी समुदाय के लिए जीवन रेखा समान हैं। इन संसाधनों पर बाहरी हस्तक्षेप और अनियंत्रित दोहन ने आदिवासियों को उनके मूल अधिकारों से वंचित कर दिया है। इसके बावजूद, यह मुद्दा आदिवासियों को एकजुट करने में असफल रहा है। इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं:
1. **बाहरी प्रभाव**: बाहरी कंपनियाँ और सरकारें आदिवासियों के संसाधनों का शोषण करती हैं, जिससे समाज के लोग आपस में विभाजित हो जाते हैं। जल, जंगल, जमीन की कटाई और दोहन, रेत माफिया का गिरोह, बाहरी लोगों के प्रभाव में हमारे लोग शिक्षा के अभाव में शोषण का शिकार हो जाते हैं, जिससे बाहरी लोग धनवान बनते हैं और आदिवासी समाज पिछड़ता जाता है।
2. **नेतृत्व का अभाव**: प्रभावी और प्रेरणादायक नेतृत्व की कमी भी एक बड़ा कारण है, जिससे आदिवासी समुदाय संगठित नहीं हो पाता। पारंपरिक सभाएँ अब इतिहास के पन्नों पर लटक रही हैं। हमारे जनप्रतिनिधि अपने ही पारंपरिक गतिविधियों को तोड़ रहे हैं और बाहरी सभाओं में जा रहे हैं। इससे आदिवासी समाज का विकास नहीं हो पा रहा है।
#### बाहरी संस्कृति का प्रभाव
आदिवासी समाज पर बाहरी संस्कृति, रीति-रिवाज, और परंपराओं का प्रभाव बढ़ रहा है। यह प्रभाव कुछ इस प्रकार है:
1. **संस्कृति का ह्रास**: बाहरी संस्कृति के प्रभाव से आदिवासी अपनी परंपराओं और संस्कृति से दूर हो रहे हैं। यह उनकी पहचान को कमजोर कर रहा है। सरगुजा संभाग में बाहरी प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, लेकिन स्थानीय आदिवासी समाज आर्थिक तंगी के कारण अपनी परंपराओं को धूमधाम से नहीं मना पा रहा है।
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2. **सामाजिक दबाव**: बाहरी समाज का दबाव आदिवासियों को अपनी संस्कृति छोड़ने और बाहरी रीति-रिवाज अपनाने पर मजबूर कर रहा है। बाहरी समाज का दबाव और आदिवासी बहु-बेटियों पर बाहरी लोगों की नजर के कारण कई आदिवासी बेटियां अन्य समाजों में विवाह कर रही हैं। गांवों में सामाजिक एकता की कमी भी इसका एक बड़ा कारण है।
#### निष्कर्ष
आदिवासी समाज को एकजुट और जागरूक करने के लिए कई प्रयासों की आवश्यकता है। शिक्षा का स्तर बढ़ाना, आर्थिक सहायता प्रदान करना, और प्रभावी नेतृत्व का विकास करना आवश्यक है। साथ ही, बाहरी प्रभावों से मुक्त रहकर अपनी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखना भी महत्वपूर्ण है। 459वी रानी दुर्गावती मंडावी जी का बलिदान दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि अपनी पहचान और अधिकारों के प्रति सजग रहना अनिवार्य है।
यह सिर्फ विचार है यह किसी व्यक्तिगत किसी पर टिप्पणी और ना ही किसी अध्यक्ष ना किसी पदाधिकारी पर दबाव है यह स्वतंत्र लेख है और विचार है… जिसे सिर्फ विचर सोचे समझे कि आप समाज के लिए क्या कर सकते हैं और उन लोगों को मैसेज फॉरवर्ड करें जो समाज में सिर्फ खाने के लिए पैदा हुए है
विचारक: राकेश सांडिल
Author: Shambhoo Dwip
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