“कौन बचाएगा जंगलों को, जब सरकार खुद कुल्हाड़ी बन जाए?”हसदेव अरण्य: केते कोल परियोजना विस्तार पर रोक की मांग

 

हसदेव अरण्य: केते कोल परियोजना विस्तार पर रोक की मांग

 

ब्रिंदा करात ने केंद्रीय मंत्री को लिखा पत्र, वन विनाश और जनविरोध को बताया गंभीर मुद्दा

🖊 विशेष रिपोर्ट : संजय पराते

 

नई दिल्ली। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद बृंदा करात ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में केते कोल परियोजना के विस्तार को तुरंत रोकने की मांग की है।

अपने पत्र में करात ने इस परियोजना को संविधान, पर्यावरणीय कानूनों और आदिवासी ग्राम सभाओं की राय की खुली अवहेलना बताते हुए कहा कि यह मंजूरी 1500 से अधिक स्थानीय आपत्तियों को दरकिनार कर दी गई है।

 

उन्होंने चेतावनी दी है कि परियोजना के विस्तार से 1742 हेक्टेयर घने जंगल नष्ट होंगे और 4.5 लाख से अधिक पेड़ काटे जाएंगे, जिससे न केवल हसदेव क्षेत्र, बल्कि आस-पास के गांवों का पर्यावरणीय संतुलन भी बिगड़ जाएगा। यह क्षेत्र जैव विविधता, जल स्रोतों और कार्बन अवशोषण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 

करात ने आरोप लगाया कि यह परियोजना जनहित की आड़ में निजी मुनाफाखोरी का ज़रिया बन चुकी है। उन्होंने कहा कि यह खनन परियोजना राजस्थान सरकार और अडानी एंटरप्राइजेज के संयुक्त उपक्रम द्वारा संचालित की जा रही है, जिसमें अडानी की 74% हिस्सेदारी है। उन्होंने दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर यह भी कहा कि खनन किया गया कोयला ‘अस्वीकृत’ घोषित कर निजी कंपनियों को बेचा जा रहा है, जो कि जनहित के नाम पर जनधन और जंगल की लूट है।

करात ने केंद्रीय मंत्री के उस कथन की भी आलोचना की जिसमें उन्होंने कहा था कि वन अधिकार अधिनियम के चलते जंगल नष्ट हो रहे हैं। उन्होंने इसे पूरी तरह भ्रामक और कॉरपोरेट हितों के पक्ष में दिया गया बयान करार दिया। उनका कहना है कि असली वनविनाश निजी कंपनियों की खनन परियोजनाओं से हो रहा है, जबकि आदिवासी ही भारत के वनों के सच्चे रक्षक हैं, जो बार-बार प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए आंदोलन करते आ रहे हैं।

 

अंत में, माकपा नेता ने केंद्रीय मंत्री से अपील की है कि वे कॉरपोरेट हितों की बजाय पर्यावरण, आदिवासियों और भविष्य की पीढ़ियों के हित में फैसला लें और इस परियोजना के विस्तार पर तत्काल रोक लगाएं।

 

 

Shambhoo Dwip
Author: Shambhoo Dwip

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