छत्तीसगढ़ में ननों और आदिवासी ईसाइयों पर हमला – जबरन धर्मांतरण का झूठ, हिंदुत्व एजेंडा की सच्चाई! 🔹 एनआईए की राजनीति और अदालत की फटकार: सिस्टर प्रीति व सुखमन मंडावी को मिली ज़मानत

 

छत्तीसगढ़: जबरन धर्मांतरण नहीं, जबरन हिंदुत्व राष्ट्र बनाने का प्रयास — वृंदा करात
सिस्टर प्रीति, वंदना फ्रांसिस और सुखमन मंडावी को झूठे आरोप में जेल, एनआईए अदालत से मिली ज़मानत

दुर्ग/रायपुर।
माकपा की वरिष्ठ नेता वृंदा करात के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय विपक्षी प्रतिनिधिमंडल ने दुर्ग केंद्रीय जेल में उन दो ननों – सिस्टर प्रीति मैरी और वंदना फ्रांसिस – से मुलाकात की, जिन्हें कथित जबरन धर्मांतरण और मानव तस्करी के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। प्रतिनिधिमंडल में सीपीआई, केसी(एम), आरएसपी और अन्य दलों के सांसद शामिल थे।

वृंदा करात ने जेल से लौटकर आरोप लगाया कि “यह मामला जबरन धर्मांतरण का नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ को जबरन हिंदुत्व राष्ट्र में बदलने की एक सोची-समझी साजिश है।” उन्होंने कहा कि दोनों नन कई वर्षों से आदिवासी इलाकों में गरीबों की सेवा कर रही हैं, और उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोप झूठे और राजनीति से प्रेरित हैं।

इस मामले में एक आदिवासी युवक सुखमन मंडावी और तीन आदिवासी युवतियाँ भी शामिल थीं, जो आगरा स्थित संस्था में रसोई सहायिका के रूप में काम करने जा रही थीं। सभी ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि वे स्वेच्छा से यात्रा कर रही थीं और उनके माता-पिता की भी सहमति थी। फिर भी, बजरंग दल के लोगों ने रेलवे स्टेशन पर उत्पात मचाया, पुलिस की मौजूदगी में मारपीट की और धार्मिक आधार पर गालियाँ दीं।

ननों के साथ ही सुखमन मंडावी को भी गिरफ़्तार किया गया और मामले को ज़मानत से बचाने के लिए एनआईए को सौंप दिया गया। एनआईए अदालत में हुई सुनवाई के बाद अब तीनों को ज़मानत मिल गई है। वृंदा करात ने कहा कि इस मामले में वीडियो सबूतों के बावजूद हमलावरों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिससे यह स्पष्ट है कि बजरंग दल को राज्य की भाजपा सरकार का संरक्षण प्राप्त है।

करात ने कांग्रेस सरकार की पूर्व भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि “जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब भी आदिवासी ईसाई समुदाय पर कई हमले हुए, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।” उन्होंने कहा कि माकपा ने दोनों ही शासनकाल में पीड़ितों के साथ एकजुटता दिखाई है।

इस बीच, ननों ने प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के दौरान बताया कि उन्हें जेल में बुखार और स्वास्थ्य समस्याएं हैं, लेकिन उन्हें बिस्तर तक नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें ‘विदेशी’ और ‘दीमक’ कहकर अपमानित किया गया, जिससे वे बेहद आहत हुईं।

यह मामला न केवल धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है, बल्कि भारत के नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों – जैसे देश में कहीं भी जाने और काम करने की स्वतंत्रता – पर भी सीधा हमला है।


📞 संपर्क:
लेखिका – वृंदा करात (माकपा पोलिट ब्यूरो की पूर्व सदस्य)
अनुवादक – संजय पराते (उपाध्यक्ष, छत्तीसगढ़ किसान सभा)
मो.: 94242-31650


अगर आप चाहें, तो मैं इस न्यूज़ को पोस्टर या वीडियो स्क्रिप्ट में भी बदल सकता हूँ।

Shambhoo Dwip
Author: Shambhoo Dwip

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