*छत्तीसगढ़, हसदेव परसा,केते, बासन, घाट बर्रा – हसदेव अरण्य:* हाल ही में छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में आदिवासी नेता और प्रकृति प्रेमी **रामलाल करियम** और उनके समर्थकों पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया, जिससे क्षेत्र में तनाव और आक्रोश फैल गया है। रामलाल करियम, जो आदिवासी समुदाय के जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं, खून से लथपथ हो गए। इस घटना ने सरकार और प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है।

**हसदेव बचाओ आंदोलन और आदिवासी पीड़ा**
हसदेव अरण्य छत्तीसगढ़ की एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय और सांस्कृतिक धरोहर है। यह क्षेत्र न केवल अपनी जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यहां का आदिवासी समुदाय इस भूमि पर पूरी तरह निर्भर है। खनन परियोजनाओं ने इन आदिवासियों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है, और यही कारण है कि वे “हसदेव बचाओ आंदोलन” के माध्यम से अपनी आवाज़ उठा रहे हैं।
आदिवासी समुदाय की यह लड़ाई केवल पर्यावरण संरक्षण की नहीं है, बल्कि उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान की भी है। इस क्षेत्र के आदिवासी कई पीढ़ियों से इस भूमि पर निर्भर हैं, और उनके लिए यह भूमि उनकी आस्था और परंपराओं का भी प्रतीक है। खनन से न केवल जंगल नष्ट हो रहे हैं, बल्कि उनके जीवन और संस्कृति पर भी संकट गहरा रहा है।
**सरकार की नीतियों पर सवाल**
छत्तीसगढ़ में सत्ता में रहीं दोनों प्रमुख पार्टियां, **भाजपा और कांग्रेस**, ने इस मुद्दे को नजरअंदाज किया है। “एक पेड़ मां के नाम पर” जैसे नारों के बावजूद, सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं, और आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है। रामलाल करियम पर लाठीचार्ज इस बात का संकेत है कि सरकारें अभी भी आदिवासी समस्याओं को हल करने के बजाय उन्हें दबाने का प्रयास कर रही हैं।
**आंदोलन की दिशा और भविष्य**
हसदेव बचाओ आंदोलन केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समुदाय की अस्तित्व और उनके अधिकारों की लड़ाई भी है। सरकार को खनन परियोजनाओं से मिलने वाले आर्थिक लाभ और आदिवासियों के जीवन के बीच संतुलन बनाना होगा। यह आंदोलन देश भर के आदिवासी समुदायों के अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बन चुका है, और इसे गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
**समाज और प्रशासन की जिम्मेदारी**
इस घटना ने एक बार फिर प्रशासनिक तंत्र की क्रूरता को उजागर किया है। सरकारों को अब यह समझना होगा कि आदिवासी समुदाय की मांगें केवल चुनावी लाभ का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि उनके जीवन और अस्तित्व से जुड़े असली मुद्दे हैं।
**निष्कर्ष:**
हसदेव बचाओ आंदोलन आदिवासी समुदाय की संस्कृति, अस्तित्व और पर्यावरण की रक्षा की लड़ाई है। रामलाल करियम और उनके समर्थकों पर हुए लाठीचार्ज ने सरकार की असंवेदनशीलता और आदिवासी विरोधी नीति को उजागर कर दिया है। आदिवासी समुदाय के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए निर्णायक कदम उठाने का समय आ गया है।
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**- राकेश सांडिल**
(शंभू शक्ति सेना, छत्तीसगढ़)
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Author: Shambhoo Dwip
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