*सेवा पनमेश्वरी दाई: मांझी समाज की धरोहर और शंभू के वंशजों का गौरव**

रानी दुर्गावती प्रकाशन –

**सेवा पनमेश्वरी दाई: मांझी समाज की धरोहर और शंभू के वंशजों का गौरव**

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के छोटे से गांव बोरसी में 21 नवंबर 1984 को जन्मे सरजू मांझी, अपने समाज के इतिहास और संस्कृति को संजोने के एक मिशन पर हैं। मांझी समाज के शोधकर्ता और चेतना के वाहक सरजू मांझी ने भले ही आर्थिक परिस्थितियों के कारण अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाई, लेकिन उनका इतिहास के प्रति रुचि और अपने समुदाय के प्रति समर्पण बेमिसाल है।

 

सरजू मांझी का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ, जहां उनके पिता का नाम पटवारी मांझी और माता का नाम ननकी बाई मांझी है। सरजू मांझी के पांच बहनें भी हैं। प्राथमिक शिक्षा उन्होंने अपने गांव बोरसी में पूरी की, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। हालांकि, बचपन से ही उनका पढ़ाई और लेखन में गहरा लगाव था, जिसके चलते उन्होंने शायरी और कविताएं लिखनी शुरू की।

 

### **संस्कृति के प्रति जागरूकता का उदय**

 

सरजू मांझी के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब छत्तीसगढ़ के कोरबा में बुधवारी बाजार में आदिवासी शक्तिपीठ में प्रथम बार उत्सव मनाया गया। इस आयोजन ने उन्हें अपनी संस्कृति और इतिहास के प्रति गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया। उसी समय से उन्होंने अपने समाज और कुल देवी पनमेश्वरी दाई के बारे में विस्तार से लिखने का निर्णय लिया।

 

### **पनमेश्वरी दाई: मांझी समाज की कुलदेवी**

 

पनमेश्वरी दाई, जिन्हें मांझी समाज के लोग बड़ी श्रद्धा से पूजते हैं, शंभू के वंशजों (बुढालपेन) की कुलदेवी हैं। सरजू मांझी ने अपने समुदाय की इस देवी पर आधारित एक पुस्तक लिखने का बीड़ा उठाया। उन्होंने 10-12 वर्षों तक गहन शोध किया, अपने पूर्वजों से जानकारी एकत्रित की और इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने का काम किया।

 

### **राज्य गोंडवाना और मांझी समाज का गौरव**

 

सरजू मांझी की यह पुस्तक न केवल उनके परिवार और गांव के लिए बल्कि पूरे मांझी समाज के लिए एक धरोहर के समान है। यह पुस्तक राज्य गोंडवाना के गौरव और मांझी समाज के इतिहास को संजोने का महत्वपूर्ण प्रयास है। यह मांझी समाज की संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं का दस्तावेज है, जिसे सरजू मांझी ने अपनी लेखनी के माध्यम से जीवित रखा है।

 

### **पुस्तक का प्रकाशन और महत्व**

 

सरजू मांझी की इस पुस्तक का प्रकाशन मध्य प्रदेश के रानी दुर्गावती प्रेस में हुआ है। यह पुस्तक मात्र ₹30 की मामूली कीमत पर उपलब्ध है, लेकिन इसका सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व अमूल्य है। यह पुस्तक मांझी समाज के इतिहास, उनके संघर्ष और उनकी धार्मिक धरोहरों का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

 

सरजू मांझी की इस पहल ने न केवल मांझी समाज को गर्वित किया है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत भी प्रदान किया है। यह पुस्तक समाज के इतिहास को संरक्षित करने और नई पीढ़ी को अपनी धरोहर से अवगत कराने का एक प्रयास है।

 

सरजू मांझी द्वारा लिखित यह पुस्तक न केवल मांझी समाज के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए एक अद्वितीय उपहार है, जो उनके इतिहास, संस्कृति और धरोहर को सहेजने का एक सफल प्रयास है।

 

उड़ीसा के संबलपुर शहर में स्थित समलाई मंदिर, न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति और इतिहास का प्रतीक भी है। संबलपुर के राजाओं द्वारा निर्मित यह मंदिर, मांझी समुदाय के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसमें स्थापित देवी समलाई दाई, मांझी समुदाय की कुलदेवी मानी जाती हैं।

 

### **समलाई दाई: एक अद्वितीय देवी का इतिहास**

समलाई दाई का इतिहास सदियों पुराना है, और इसे मांझी समुदाय के बुजुर्ग पीढ़ी दर पीढ़ी अपने वचनों से संजोते आ रहे हैं। इस मंदिर में स्थापित देवी को आदिवासी समाज प्रकृति की शक्ति के रूप में पूजता है। समलाई दाई का नाम भी प्रकृति से जुड़ा है। कहा जाता है कि समलाई नाम, सेमल के पेड़ से प्रेरित है। आदिवासी लोग सेमल के पेड़ के नीचे बिना किसी आकर के पत्थर को रखकर पूजा करते थे और अपनी प्रकृति शक्ति को जागृत करते थे। इस पूजा की परंपरा के आधार पर ही देवी का नाम समलाई दाई पड़ा।

यह भी माना जाता है कि संबलपुर शहर का नाम भी इसी देवी के नाम पर पड़ा है। संबलपुर के लोग समलाई दाई को संबलपुरहीन दाई के रूप में भी पूजते हैं, और शहर की धार्मिक पहचान से जोड़ते हैं।

### **सरजू मांझी: इतिहास को संजोने का प्रयास**

मांझी समुदाय के इतिहास और समलाई दाई की पूजा की परंपरा को संजोने का श्रेय सरजू मांझी जी को जाता है। सरजू मांझी जी ने अपने समुदाय के इतिहास को संकलित करने के लिए लगभग 10-12 वर्षों तक व्यापक शोध किया। उन्होंने अपने पूर्वजों और समाज के बुजुर्गों से जानकारी एकत्रित कर इस अद्वितीय इतिहास को एक पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया।

हालांकि सरजू मांझी जी की शिक्षा अधिक नहीं थी, लेकिन उनके इतिहास के प्रति रुचि और लगन ने उन्हें इस पुस्तक को लिखने के लिए प्रेरित किया। इस पुस्तक का प्रकाशन मध्य प्रदेश के रानी दुर्गावती प्रेस में हुआ है। यह पुस्तक मांझी समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में उभरी है, जो उनके सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित और प्रचारित करने में सहायक है।

### **समलाई मंदिर का महत्व**

समलाई मंदिर न केवल मांझी समुदाय के लिए बल्कि पूरे संबलपुर क्षेत्र के लोगों के लिए एक आस्था का केंद्र है। यह मंदिर आदिवासी धरोहर और मातृशक्ति की पूजा की प्राचीन परंपरा का प्रतीक है। यहां देवी की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाती है, और विशेष पर्वों पर यहां भारी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं।

समलाई दाई का मंदिर आज भी उस पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है, जिसमें प्रकृति की पूजा, मातृशक्ति का सम्मान और अपने पूर्वजों की धरोहर को संजोने की भावना शामिल है। इस मंदिर और देवी समलाई दाई के इतिहास से संबलपुर की पहचान जुड़ी हुई है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।

समलाई दाई का यह मंदिर और इसका इतिहास हमें यह सिखाता है कि कैसे एक समुदाय अपनी परंपराओं और धरोहरों को सहेजकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा सकता है। यह मंदिर न केवल धार्मिक स्थल है, बल्कि एक जीता जागता इतिहास है, जो संबलपुर की संस्कृति, समाज और धरोहर का प्रतीक है।

Shambhoo Dwip
Author: Shambhoo Dwip

जोहार शंभू द्वीप न्यूज़ चैनल में आपका स्वागत है गोंडवाना की धरती पर आपकी आवाज .... जिस धरती पर जिसकी पहचान हो ,जिस धरती पर उसका नाम हो, आज वही मूल मालिक अपनी पहचान के लिए दर-दर भटक रहा है, बाहर के लोगों का उनकी संस्कृति पर हमला, इसलिए शंभू द्वीप न्यूज़ चैनल गोंडवाना की धरती पर आपका आवाज... हमें सपोर्ट करें

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