बिश्रामपुर – आज ग्राम पंचायत शिवनंदनपुर में करमा पर्व को एक साथ मनाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में ग्राम के बुजुर्गों और युवाओं ने सामूहिक रूप से भाग लिया और इस पहल का जोरदार समर्थन किया। करमा पर्व, जो आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, बीते 40-50 वर्षों में विभिन्न स्थानों पर बंट गया था, जिससे पर्व की रौनक और उत्साह में कमी आई थी।
राकेश सांडिल – “ना मांदर की थाप और ना ही करम देवता का ध्यान, उजड़ गया है तेरा प्रकृति से ध्यान

**ग्राम पंचायत शिवनंदनपुर में करमा पर्व के सामूहिक आयोजन की पहल**

बैठक में यह निष्कर्ष निकला कि यदि करमा पर्व को पुनः एक ही स्थान पर मनाया जाए, तो इसका उत्साह और तैयारियों की भावना को पुनर्जीवित किया जा सकता है, जिससे पूरे समुदाय में एकता और सहयोग की भावना को बढ़ावा मिलेगा। इस विचार का समर्थन ग्राम के प्रतिष्ठित लोग जैसे महेंद्र सिंह नेताम, ज्योत नेताम, राकेश सांडिल, शिव भजन सिंह, मंठु सांडिल, जीवन सिंह, रामचंद्र सिंह सांडिल, सुधन राजवाड़े, मनिष पोया, नंदलाल, बिजेंद्र सिंह, बिजेंद्र सिंह पोता, मंगल साय , और कई अन्य ग्रामीणों ने किया।
इस प्रकृति पर्व को बड़ी धूमधाम से बनाएं इसलिए लगातार गांव में मीटिंग चल रहे हैं दिनांक 19 अगस्त 2024 दिन सोमवार सुबह 7:00 बजे स्थान – बड़ा पीपल, गांव शिवनंदनपुर
**प्रकृतिवाद की महत्ता और करमा पर्व**
राकेश सांडिल, जो इस बैठक का आयोजन करने वाली “जय सेवा समिति” के अध्यक्ष हैं, ने करमा पर्व के महत्व को समझाते हुए कहा कि यह पर्व हमारे समाज में रिश्तों, प्रकृति और जीवन के महत्व को दर्शाने वाला एक अनूठा त्यौहार है। करमा पर्व आदिवासी समाज के जीवन में प्रकृति के साथ गहरे संबंधों को प्रकट करता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जल, जंगल, और जमीन के बिना हमारा जीवन असंभव है। प्रकृति के प्रति करम करने से हमें जितना आशीर्वाद मिलेगा, हमारा जीवन उतना ही समृद्ध और संतुलित होगा।
सामूहिकता और एकता के प्रतीक के रूप में, सभी ग्रामीणों ने यह संकल्प लिया कि वे एक साथ मिलकर करमदार को लेने जाएंगे और फिर उसी सामूहिकता के साथ करम को प्रकृति में विलीन करेंगे। यह पारंपरिक रूढ़ियों के प्रति उनके सम्मान और उनकी जीवंत संस्कृति की गहरी जड़ों को दर्शाता है। करमा पर्व न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह समाज की एकजुटता, सहयोग, और प्रकृति के प्रति उनके अनन्य प्रेम का प्रतीक भी है।
**समाज और परिवार के लिए शुभकामनाएं**
बैठक के दौरान, राकेश सांडिल ने यह भी बताया कि करमा पर्व के माध्यम से समाज और परिवार के लिए खुशहाली और शांति की कामना की जाती है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि हमारे पूर्वजों द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलकर, हम प्रकृति से अपने गांव और परिवार के लिए सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। जब खेतों में रोपा लग जाता है और प्रकृति की कृपा से फसल लहलहाने लगती है, तब इस पर्व के माध्यम से हम अपनी मेहनत का फल प्राप्त करने की खुशी मनाते हैं।
इस खुशी को हम पारंपरिक व्यंजन “रसोरा” बनाकर और इसे परिवार और समाज के साथ बांटकर प्रकट करते हैं। इसे लोकल भाषा में “पारन” कहा जाता है, जिसमें पूरे गांव का मिलकर खान-पान का आयोजन होता है।
**समापन**
इस बैठक का आयोजन रविवार, 18 अगस्त 2024 को बड़े पीपन के पास किया गया, जिसमें ग्रामीण समाज के लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया और करमा पर्व को एक साथ मनाने के संकल्प को मजबूत किया। इस पर्व में न केवल समाज की एकजुटता दिखती है, बल्कि यह प्रकृति के साथ हमारे गहरे संबंधों का भी प्रतीक है। आइए, हम सभी इस करमा पर्व को धूमधाम से मनाएं और प्रकृति के साथ जुड़े रहें, क्योंकि प्रकृति में ही जीवन का सार निहित है।
राकेश सांडिल – मेरा एक ही संकल्प है जिस तरीके से हम अन्य त्योहारों को बड़ी धूमधाम बनाते हैं ठीक उसी प्रकार से हमें इस प्रकृति त्यौहार करमा पर्व को भी बड़ी धूमधाम से बनाना है क्योंकि प्रकृति के बिना मानव जीवन अधूरा है इस करमा पर्व पर एक गहरा राज छुपा हुआ है जो निरंतर प्रकृति के कहानी सुनने पर अध्ययन हो पाता है और जो प्रकृति के लिए जितना करम करेगा उसके लिए प्रकृति उतना ही करम लिखता है फल देता है जोहार शंभू, जोहार बिरसा
✒️ राकेश सांडिल
Author: Shambhoo Dwip
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