#### आदिवासी समुदाय का संघर्ष: वेदांता समूह का स्टील प्लांट

वेदांता समूह के स्टील प्लांट के खिलाफ स्थानीय आदिवासी समुदाय का संघर्ष ने एक नया मोड़ लिया जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। सुप्रीम कोर्ट ने वेदांता समूह के इस प्लांट पर रोक लगाते हुए अपने निर्णय में लिखा, “न लोकसभा, न विधानसभा सबसे बड़ी ग्राम सभा।” यह वाक्य आदिवासी समुदाय के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि यह पांचवीं और छठी अनुसूची का सार है।
#### रामकृपाल भगत बनाम बिहार स्टेट मामला
1969 में रामकृपाल भगत बनाम बिहार स्टेट मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि जब तक राज्यपाल राष्ट्रपति की अनुमति से लोक अधिसूचना जारी नहीं करते, आदिवासी क्षेत्रों में कलेक्टर भी सामान्य नागरिक होगा। इस फैसले ने आदिवासी समुदाय को उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का आश्वासन दिया था, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह उम्मीद टूटती हुई दिखाई देती है।
#### आदिवासी समुदाय का ऐतिहासिक संघर्ष
आदिवासी समुदाय का संघर्ष अंग्रेजों के आने के बाद शुरू हुआ था और 185 साल के लंबे संघर्ष के बाद, भारत सरकार अधिनियम 1935 में अनुच्छेद 91 और 92 में ट्राइबल एरिया के लिए प्रावधान किए गए। इस अधिनियम ने आदिवासी क्षेत्रों को स्वशासन का अधिकार दिया। पूना पैक्ट 1932 ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
#### भारत सरकार अधिनियम 1935 और संविधान की अनुसूचियाँ
भारत सरकार अधिनियम 1935 के सेक्शन 311 ने भारत को तीन क्षेत्रों में बाँटा:
1. भारत
2. भारत का राज्य क्षेत्र
3. ट्राइबल एरिया
संविधान की पहली अनुसूची में भारत और भारत के राज्य क्षेत्र को शामिल किया गया और ट्राइबल एरिया की धारा 91 और 92 को संविधान के अनुच्छेद 244(2) में 4 राज्यों और अनुच्छेद 244(1) में 10 राज्यों में डाला गया, जिन्हें पांचवीं और छठी अनुसूची कहा जाता है।
#### संवैधानिक प्रावधान और प्रशासनिक विफलताएँ
पांचवीं अनुसूची के पैरा 5(1) के तहत राष्ट्रपति की अनुमति से राज्यपाल जो लोक अधिसूचना जारी करते हैं, उनके अलावा न संसद और न ही विधानसभा इनमें विशेष छेड़छाड़ कर सकती है। पेसा कानून 1996 की धारा 4(0) के तहत हर राज्य में 20 सदस्यों की एक स्वायत्तशासी परिषद का गठन करना था, लेकिन एक भी राज्य में इस परिषद का सही तरीके से गठन नहीं हुआ।
#### आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार
संविधान के अनुच्छेद 13(3) भी आदिवासी समाज को संरक्षण प्रदान करता है। इसके बावजूद, सामान्य प्रशासन आदिवासी क्षेत्रों में लागू नहीं होता है। न्यायपालिका और कार्यपालिका की विफलताएँ इस मुद्दे को और जटिल बनाती हैं।
#### नक्सलवादी आंदोलन और आदिवासी संघर्ष
1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव से शुरू हुआ नक्सलवादी आंदोलन आदिवासी क्षेत्रों में फैल गया। इस आंदोलन ने यह स्पष्ट किया कि आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों के लिए लड़ने से पीछे नहीं हटेंगे। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन देश के विकास के लिए आवश्यक हो सकता है, लेकिन इसके लिए आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन उचित नहीं है।
#### छोटुभाई वसावा की कहानी
गुजरात के आदिवासी विधायक छोटुभाई वसावा ने एक कहानी साझा की, जिसमें एक आदिवासी ने अपनी जमीन छीनने वाले दबंग का कटा हुआ सर अदालत में जज की टेबल पर रख दिया। यह कहानी इस बात का प्रतीक है कि आदिवासी समुदाय अपने न्याय और अधिकारों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
#### निष्कर्ष
आदिवासी समुदाय का संघर्ष केवल जल, जंगल, और जमीन के लिए नहीं है, बल्कि यह उनके अस्तित्व और पहचान की लड़ाई भी है। प्रशासनिक और न्यायिक सिस्टम को इस संघर्ष को गंभीरता से लेना चाहिए और आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
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**लेखक: प्रेमाराम सियाग**
Author: Shambhoo Dwip
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