कोरबा, 24 जून: विश्व की प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ, बुधवारी बाजार में 24 जून को गोंडवाना साम्राज्ञी महारानी दुर्गावती मरावी की 459 वीं बलिदान दिवस पर एक संगोष्ठी एवं पुष्पांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर महारानी के शौर्य और बलिदान को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस कार्यक्रम में विभिन्न वक्ताओं ने आदिवासी संस्कृति, जल, जंगल और जमीन के महत्व पर भी अपने विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम में विश्शव की प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ के सांस्कृतिक प्रमुख रूपेन्द्र कुमार पैकरा ने महारानी दुर्गावती के शौर्य की गाथाओं को याद करते हुए कहा कि जब अधिकांश राजा मुगल सल्तनत के आगे नतमस्तक होकर दरबारी बन गए थे, तब महारानी दुर्गावती ने अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। उन्होंने रणभूमि में लड़ते हुए षड्यंत्र का सामना किया और मातृभूमि के लिए बलिदान देकर अमर हो गईं। ### रानी दुर्गावती बलिदान दिवस पर शंभू शक्ति सेना के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सांडिल ने किया रक्तदान

आर एस मार्को ने अपने उद्बोधन में विस्तार से बताया कि गढ़ा मंडला की महारानी दुर्गावती के पास एक सफेद हाथी था, जिसका नाम सरमन था। मुगल बादशाह अकबर ने इसे अपने हवाले करने का फरमान जारी किया था, परंतु रानी ने इसका माकूल जवाब देकर युद्धभूमि में लड़ने की चुनौती दी। रानी के वीरगति प्राप्त होते ही हाथी सरमन ने भी पत्थर से सिर पटक कर अपने प्राण त्याग दिए। इस प्रसंग को याद करते हुए उन्होंने कहा कि महारानी दुर्गावती ने न केवल अपने राज्य के लिए बल्कि आदिवासी संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिए भी अपने प्राणों की आहुति दी।

संगोष्ठी में अध्यक्ष शिव नारायण सिंह कंवर ने अपने वक्तव्य में आदिवासी समाज के जल, जंगल और जमीन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि महारानी दुर्गावती ने जिस साहस और धैर्य का परिचय दिया, वह आज भी आदिवासी समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। जल, जंगल और जमीन आदिवासी समाज की जीवनरेखा हैं और इन्हें संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है।
बी एम ध्रुर्वे, गंगा सिंह कंवर, मनोहर प्रताप सिंह तंवर ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि महारानी दुर्गावती का बलिदान आज भी हमें संघर्ष और साहस की प्रेरणा देता है। आदिवासी समाज की संपत्ति जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए हमें संगठित होकर काम करना होगा।
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महिला प्रभाग से कृष्णा राजेश, रमा राज, और मोना ध्रुव ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने आदिवासी महिलाओं की भूमिका और उनके योगदान पर प्रकाश डाला और कहा कि महारानी दुर्गावती का साहस और उनकी नेतृत्व क्षमता आज की महिलाओं के लिए प्रेरणादायक है।
अंत में पुष्पांजलि अर्पित की गई। संगोष्ठी का संचालन निर्मल सिंह राज ने किया। इस अवसर पर शक्ति पीठ के गणमान्य सदस्य, महिला एवं युवा प्रभाग के पदाधिकारी सहित कई अन्य सदस्य उपस्थित रहे।
इस कार्यक्रम ने न केवल महारानी दुर्गावती के बलिदान को याद किया, बल्कि आदिवासी समाज के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के महत्व पर भी जोर दिया। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में इस बात पर बल दिया कि हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करनी चाहिए और अपने पूर्वजों की गौरवशाली विरासत को संजोकर रखना चाहिए।
Author: Shambhoo Dwip
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