राजनांदगांव ,भालूकोंहा, – गोंडी भाषा, जिसे विश्व की सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक माना जाता है, आज विलुप्ति के कगार पर है। कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां गोंड समुदाय निवास तो करता है, लेकिन वहां गोंडी भाषा लगभग समाप्त हो चुकी है। इसी संकट को देखते हुए गोंडी भाषा के प्रचार-प्रसार और संरक्षण के लिए **2 फरवरी से 15 फरवरी तक “गोंडी पखवाड़ा”** मनाने की ऐतिहासिक पहल की गई है।

**गोंडी भाषा: हमारी पहचान और इतिहास का आधार**
गोंडी भाषा न केवल संवाद का माध्यम है, बल्कि यह आदिवासी समाज की पहचान, रीति-रिवाज और परंपराओं को संजोए रखने का माध्यम भी है। जब तक हम अपनी भाषा को नहीं जानेंगे और इसे संरक्षित नहीं करेंगे, तब तक हमारी सांस्कृतिक जड़ें कमजोर होती रहेंगी। यह भाषा ही हमारे असली इतिहास को सुरक्षित रखती है, और यदि इसे संरक्षित नहीं किया गया तो समाज के सांस्कृतिक अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
गोंडवाना रत्न मोतीरावण कंगाली जी की जयंती पर शिवनंदनपुर में गोंडी भाषा दिवस का भव्य आयोजन
आज धर्मांतरण, बाहरी प्रभाव और आधुनिकता के कारण हमारी पारंपरिक भाषा और संस्कृति खतरे में है। गोंडी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए इस गोंडी पखवाड़े का आयोजन किया जा रहा है, ताकि लोग पुनः अपनी मूल भाषा की ओर लौटें और इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।
“गोंडी पखवाड़ा: एक जन आंदोलन”
गोंडी भाषा प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने इस आयोजन को लेकर जबरदस्त उत्साह दिखाया है। **गोंडी पखवाड़ा के तहत व्यापक रूप से भाषा को बढ़ावा देने की योजना तैयार की गई है, जिसमें प्रचार-प्रसार, जागरूकता अभियान, भाषा कार्यशालाएं और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।**
ग्राम **भालुकोन्हा** में इस आयोजन के लिए विशेष बैठक आयोजित की गई, जिसमें गांव के बुजुर्ग, युवा और विद्यार्थी शामिल हुए। इस दौरान **गोंडी भाषा प्रचारक अजय गोटे**, तुकाराम बोगारे, सदाराम मंडावी, गोरेलाल सोरी, अरुण हरानमे, संतलाल उसेंडी, मुन्नालाल उसेंडी, महेश कोर्राम, श्याम कोर्राम सर सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।
गोंडी भाषा को आठवीं अनुसूची में जोड़ने की मांग
गोंडी भाषा को संविधान की “आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए यह पहल एक महत्वपूर्ण कदम” है। जब किसी भाषा को संविधानिक मान्यता मिलती है, तो उसे संरक्षण और संवर्धन की दिशा में सरकारी स्तर पर सहयोग मिलने लगता है। यह आयोजन इस मांग को और अधिक प्रभावशाली तरीके से आगे बढ़ाने का एक प्रयास है।
“संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ते कदम”
गोंडी पखवाड़ा न केवल भाषा को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, बल्कि यह समाज के भीतर भाषा प्रेम और सांस्कृतिक पहचान को पुनः जागृत करने का भी एक सशक्त माध्यम बनेगा। इसके तहत –
✔ **गोंडी भाषा बोलने के लिए प्रेरित किया जाएगा।**
✔ **विद्यालयों और समुदायों में गोंडी भाषा कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी।**
✔ **गोंडी लोकगीत, लोककथाएं और परंपरागत विधाओं का प्रचार किया जाएगा।**
✔ **गोंडी भाषा में लेखन, वाचन और संवाद को प्रोत्साहित किया जाएगा।**
निष्कर्ष
गोंडी भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए यह अभियान निस्संदेह एक ऐतिहासिक कदम है। समाज के सभी वर्गों को इसमें भागीदारी निभानी होगी ताकि हमारी भाषा आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहे। “गोंडी पखवाड़ा सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि एक आंदोलन है, जो भाषा की पुनर्स्थापना और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का संदेश देता है।”
“गोंडी भाषा बचेगी, तभी इतिहास और संस्कृति बचेगी!”
_जय गोंडवाना!_
राकेश सांडिल ✒️ से
Author: Shambhoo Dwip
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