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वह दिन था जब उन्होंने पहली बार हसदेव अरण्य को देखा था। वह एक छात्र था जो रायपुर से आया था अपने शिक्षक के साथ जंगल का दौरा करने। उसने वहां की हरियाली, वन्य जीवों और आदिवासियों की संस्कृति को देखकर अपने आँखों को विश्वास नहीं किया। उसने अपने कैमरे से उन सबकी तस्वीरें खींची और अपने दोस्तों को दिखाने का वादा किया।लेकिन जब वह वापस आया तो उसने सुना कि हसदेव अरण्य में खनन का काम शुरू हो गया है। उसने अपने शिक्षक से पूछा कि यह कैसे हो सकता है? क्या वहां के लोगों की राय नहीं ली गई? क्या वहां के जीवन और पर्यावरण का कोई महत्व नहीं है? उसके शिक्षक ने उसे बताया कि यह एक लंबी लड़ाई है जिसमें आदिवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का संगठन ‘छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन’ शामिल है। वे हसदेव को बचाने के लिए विभिन्न तरीकों से प्रदर्शन और आवाज उठा रहे हैं।
उसने अपने शिक्षक से पूछा कि वह क्या कर सकता है? उसके शिक्षक ने उसे बताया कि वह अपनी तस्वीरों और कहानियों को लोगों के साथ शेयर कर सकता है। वह अपने सोशल मीडिया पर हसदेव के बारे में जानकारी दे सकता है। वह अपने स्कूल और कॉलेज में हसदेव बचाओ आंदोलन का समर्थन करने वाले फ्लैश मॉब और यूट्यूबर्स को ज्वाइन कर सकता है। वह अपनी आवाज उठाकर हसदेव को बचाने के लिए अपना योगदान दे सकता है।
उसने अपने शिक्षक का हाथ थामा और कहा कि वह यह सब करेगा। वह हसदेव को बचाने के लिए अपनी जान देने को भी तैयार था। वह जानता था कि हसदेव सिर्फ एक जंगल नहीं है, बल्कि एक जीवंत प्राणी है जिसकी धड़कन उसने सुनी थी।
“`हसदेव बचाओ एक आंदोलन है, जिसमें छत्तीसगढ़ के आदिवासी लोग हसदेव अरण्य को कोयला खनन से बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हसदेव अरण्य भारत के सबसे घने और वन्य जीवन से भरपूर जंगलों में से एक है, जहां बाघ, हाथी और अन्य जानवर पाए जाते हैं। इस आंदोलन में कई सामाजिक संगठन और राजनीतिक दल भी शामिल हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि खनन से उनका जल, जंगल और जमीन का अधिकार छीना जाएगा और पर्यावरण को नुकसान होगा।
Second story
एक दिन की बात है, एक छोटा सा गांव था, जिसका नाम था बासुड़ा। यह गांव हसदेव अरण्य के किनारे बसा हुआ था। गांव के लोग जंगल से लकड़ी, फल, फूल और जड़ी-बूटी लेकर अपना जीवन यापन करते थे। उन्हें जंगल से प्यार था, और वे उसकी रक्षा करते थे।
एक दिन, एक बड़ी कंपनी ने गांव में आकर कहा कि वे जंगल में कोयला खनन करना चाहते हैं। उन्होंने गांव वालों को बहुत सारे पैसे और रोजगार का लालच दिया। लेकिन गांव वालों ने इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे अपने जंगल को नहीं बेचेंगे, और उसकी रक्षा करेंगे।
कंपनी के लोग नाराज हो गए, और उन्होंने गांव वालों को धमकाना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि वे जबरदस्ती जंगल में घुसकर कोयला खनन करेंगे, और जो भी उनका विरोध करेगा, उसे मार देंगे। गांव वालों ने डर के बावजूद अपनी आवाज उठाई, और उन्होंने हसदेव बचाओ आंदोलन शुरू कर दिया। उन्होंने जंगल के आसपास मोर्चे बनाए, और कंपनी के लोगों को जंगल में प्रवेश करने से रोका।
इस आंदोलन की खबर मीडिया तक पहुंची, और बहुत से लोगों ने गांव वालों का समर्थन किया। कुछ समाजसेवी, पर्यावरण कार्यकर्ता, विधायक और विधानसभा सदस्य भी गांव पहुंचे, और उन्होंने कंपनी के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि वे इस कोयला खनन को रोकें, और हसदेव अरण्य को सुरक्षित रखें।
आखिरकार, सरकार ने भी गांव वालों की बात मानी, और उन्होंने कोयला खनन की अनुमति रद्द कर दी। गांव वालों ने खुशी से जयकारे लगाए, और अपने जंगल को गले लगाया। उन्होंने अपने आंदोलन को सफल बनाने के लिए सभी का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि वे हमेशा अपने जंगल की रक्षा करेंगे, और उसकी सुंदरता को बरकरार रखेंगे।
Author: Shambhoo Dwip
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आंदोलनकारियों का कहना है कि खनन से उनका जल, जंगल और जमीन का अधिकार छीना जाएगा और पर्यावरण को नुकसान होगा।










