खरसावां हत्याकांड – काला दिवस,आजादी का नया साल बनाएं या मातम का नया साल लेकिन आदिवासी समाज 1 जनवरी को काला दिवस के रूप में अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते है

झारखंड सिंहभूम – खरसावां हत्याकांड – एक तरफ नया साल का जश्न तो दूसरी तरफ काला दिवस पर मातम  आपको मालूम होगा कि इस दिन खरसावां हत्याकांड में लगभग 3000 से ज्यादा आदिवासियों को मार दिया गया था और पूरा से घूम खून से लथपथ रहे यह इतिहास के उन पन्नों पर दर्ज हैं जो कभी मिट नहीं सकता

आजादी मिले अभी 150 दिन भी नहीं हुए थे, देश का संविधान अभी बन ही रहा था, महात्मा गांधी जिंदा थे, देसी रियासतें और राजघराने अभी भी भारत के एकता के रास्ते के रोड़े बने हुए थे, हिन्दुस्तान पहली बार आजाद हवा में नये साल का जश्न मना रहा था, तभी 1 जनवरी 1948 को बड़ा गोलीकांड हुआ। आजाद भारत का यह पहला बड़ा गोलीकांड था। हजारों आदिवासियों की भीड़ पर ओडिशा मिलिट्री पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलायी थी।

खरसावां हत्याकांड
सरायकेला/ रांची

 

इस गोलीकांड में हुई मौत का कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं हैं, लेकिन कहा जाता है कि आजाद भारत के इस ‘जालियावाला बाग कांड’ में अनगिनत आदिवासियों की मौत हो गयी थी। बड़ी संख्या में लोग बुरी तरह जख्मी हुए थे, कई लोगों का अब तक अता-पता नहीं है। इसी की याद में, हर वर्ष जब दुनिया भर के लोग अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार नववर्ष का जश्न मनाते हैं, उस दिन खरसावां शहीद स्थल पहुंच कर हजारों लोग अपने पूर्वजों को नमन करते है।

लासो को खुले मैदान पर जानवरों के लिए छोड़ दिया गया 
कहा जाता है कि इस गोलीकांड के बाद नृशंसता की सारी हदें पार करते हुए शाम ढलते ही लाशों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया। 6 ट्रकों में लाशों को भर कर या तो दफन कर दिया गया या फिर जंगलों में बाघ तथा अन्य जंगली जानवरों के खाले के लिए छोड़ दिया गया। कुछ लाशों को नदियों की तेज धार में भी फेंक देने की बात कही जाती है। घायलों के साथ तो और भी बुरा सलूक किया गया। जनवरी की सर्द रात में कहराते लोगों को खुले मैदान में तड़पते छोड़ दिया गया और मांगने पर पानी भी नहीं दिया गया। जयपाल सिंह मुंडा की इसी सभा में खरसावां राहत कोष का गठन किया गया, जिसमें आदिवासी नेताओं ने 1 हजार मृतकों के परिजनों और इतने ही घायलों की मदद की जिम्मेदारी उठायी। हिन्दी में हस्तलिखित ये अपील आज भी राष्ट्रीय अभिलेखागार झारखंडियों की शहादत का सबूत है।

1 जनवरी को आदिवासी समाज खरसावां हत्याकांड को लेकर काला दिवस बनायेगा
काला दिवस

रांची: स्वतंत्र भारत में 1 जनवरी 1948 को खरसावां गोलीकांड की तुलना जालियांवालाबाग हत्याकांड से की जाती है। ओड़िसा मिलिट्री पुलिस की ओर से की गयी गोलीबारी में 35 आदिवासियों के मारे की पुष्टि हुई थी, लेकिन पीके देव की पुस्तक ‘मेमायर ऑफ ए बाइगोर एरा’ में दो हजार से ज्यादा आदिवासियों के मारे जाने का जिक्र है। कोलकाता से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘द स्टेट्समैन’ ने 3 जनवरी 1948 के एक अंक में छापा ‘ 35 आदिवासीज किल्ड इन खरसावां’। हालांकि अभी तक इस गोलीकांड का कोई निश्चित दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इस गोलीकांड की जांच के लिए ट्रिब्यूनल का गठन किया गया, पर आज तक उसकी रिपोर्ट कहा हैं, किसी को नहीं पता। इस गोलीकांड की याद में हर वर्ष एक जनवरी को शहीद सभा का आयोजन होता है और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।

खरसावां गोली कांड 1 जनवरी 1948/ फाइल फोटो 

 

एकीकृत बिहार में खरसावां आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र था, जो उस समय एक रियासत हुआ करता था। देश के तत्कालीन सरदार वल्लभभाई पटेल ने देशी रियासतों को मिलाकर संघात्मक भारत का हिस्सा बनाने के लिए इन रियासतों को तीन श्रेणियों ए, बी और सी में बांटा। ए श्रेणी में भारत की बड़ी रियासतें, बी श्रेणी में मध्यम और सी श्रेणी में छोटी रियासतें थी। खरसावां भी एक छोटी रियासत थी। इस क्षेत्र में उड़ीसा भाषी लोगों की संख्या को देखते हुए केंद्र के दबाव में मयूरभंज रियासत के साथ-साथ सरायकेला और खरसावां रियासत का ओड़िसा में विलय का समझौता हो चुका था, लेकिन खरसावां-सरायकेला के आदिवासी नहीं चाहते थे सरायकेला और खरसावां का ओड़िसा में विलय हो। उन दिनों से ही आदिवासी अलग झारखंड राज्य की मांग कर रहे थे।

खरसावां हत्याकांड/फाइल फोटो

1 जनवरी 1948 को इन तीनों रियासतों के सत्ता का हस्तांतरण भी होना था, लेकिन इसके विरोध में और अलग झारखंड राज्य की मांग कर रहे आदिवासी समाज के 50 हजार लोग खरसावां में एकत्रित हो चुके थे। इस सभा में हिस्सा लेने के लिए जमशेदपुर, रांची, सिमडेगा, खूंटी ,तमाड़, चाईबासा और दूरदराज के इलाके से आदिवासी आंदोलनकारी अपने पारंपरिक हथियारों से लैस होकर खरसावां पहुंचे थे। आंदोलन के नेतृत्वकर्त्ता जयपाल सिंह मुंडा थे, लेकिन वे खुद उस दिन खरसावां नहीं पहुंचे। दूसरी तरफ ओड़िसा सरकार किसी भी हाल में खरसावां में 1 जनवरी को सभा नहीं होने देना चाहती थी और खरसावां हाट उस दिन ओड़िसा मिलिट्री पुलिस का छावनी बन गया था। वहीं कोई नेतृत्व नहीं होने के कारण भीड़ का धैर्य जवाब दे चुका था। इसी दौरान अचानक ओड़िसा मिलिट्री पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग की। इस गोलीकांड को लेकर सात दशक से अधिक समय बीत चुका है, कई जांच कमेटिया भी बनी, लेकिन आज तक इस घटना पर कोई रिपोर्ट नहीं आयी। खरसावां गोलीकांड का जनरल डायर कौन है, इसका आज तक कोई खुलासा नहीं हुआ।

खरसावाँ (Kharsawan) भारत के झारखण्ड राज्य के सराइकेला खरसावाँ ज़िले में स्थित एक शहर है। यहाँ एक रेल स्टेशन है।

 

Shambhoo Dwip
Author: Shambhoo Dwip

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