रायगढ़ रियासत – “भारत रत्न” की सच्ची पात्रता के धनी हैं महाराजा चक्रधर सिंह – एक विलक्षण कलाकार, एक सांस्कृतिक युगदृष्टा, और जनजातीय अस्मिता के प्रतीक।
देश की सबसे बड़ी जनजातीय आबादी में से एक गोंड समाज आज अपने उस नायक को स्मरण कर रहा है, जिसने न केवल राजपाट चलाया, बल्कि सांस्कृतिक समृद्धि का एक स्वर्णिम अध्याय भी लिखा।
महाराजा चक्रधर सिंह, रायगढ़ रियासत के अंतिम स्वतंत्र शासक, एक ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने छत्तीसगढ़ और सम्पूर्ण भारत की शास्त्रीय कला परंपरा को नई ऊँचाइयाँ दीं।
अखिल भारतीय गोंडवाना गोंड महासभा के राष्ट्रीय सचिव आर. एन. ध्रुव ने देश के महामहिम राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर यह मांग की है कि गायन, वादन, नृत्य एवं अभिनय में अद्वितीय योगदान देने वाले गोंडवंशी महाराजा चक्रधर सिंह को भारत रत्न से सम्मानित किया जाए।

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राजा चक्रधर सिंह का जीवन परिचय:
जन्म: 19 अगस्त 1905
स्वर्गवास: 7 अक्टूबर 1947
शासनकाल: 1924 से 1947, रायगढ़ रियासत
वंश: गोंड वंश
शिक्षा: राजकुमार कॉलेज, रायपुर
राजा चक्रधर सिंह एक प्रतिभाशाली शासक होने के साथ-साथ एक संपूर्ण कलाकार थे। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश भाग संगीत, नृत्य और साहित्य को समर्पित कर दिया। उनके परिवार में संगीत का वातावरण था — उनके पिता भूपदेव सिंह संगीतज्ञ थे और उनके चाचा पखावज एवं तबला वादन में पारंगत थे। इस परंपरा को चक्रधर सिंह ने न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि नये शिखर तक पहुँचाया।
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सांस्कृतिक योगदान और “रायगढ़ घराना” की स्थापना:
राजा चक्रधर सिंह न केवल शास्त्रीय गायन और वादन में पारंगत थे, बल्कि उन्होंने कत्थक नृत्य की दो प्रमुख शैलियों — लखनऊ और जयपुर — के मेल से “रायगढ़ शैली” की शुरुआत की। यह नृत्य परंपरा आज भी देश-विदेश में सम्मानित होती है।
उनके दरबार में देश के कोने-कोने से कलाकार आते थे — जिनमें पंडित जयलाल, नन्हे बाबू, इनायत खां, अच्छन महाराज, बिस्मिल्लाह खां जैसे दिग्गज शामिल थे।
प्रमुख रचनाएं:
नर्तक सर्वस्व
तालतोय निधि
तलबल पुष्पकर
राजरत्न मंजूष
मुराजपरन पुष्पकर
इन रचनाओं में संगीत की गहराई, लयकारी और नृत्य की संरचना का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
कविता और उर्दू साहित्य में योगदान:
राजा चक्रधर सिंह केवल वाद्य और नृत्य के ज्ञाता नहीं थे, बल्कि उन्होंने “फरहत” उपनाम से उर्दू में ग़ज़लें भी लिखीं। उनकी साहित्यिक अभिरुचि बहुआयामी थी।
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चक्रधर समारोह:
उनके जन्मदिवस पर रायगढ़ में प्रतिवर्ष “चक्रधर समारोह” का आयोजन होता है, जो आज छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बन चुका है।
1985 से यह उत्सव राजपरिवार द्वारा शुरू हुआ और 2001 से प्रशासन द्वारा इसका आयोजन किया जाता है। देशभर के ख्यातिप्राप्त कलाकार इसमें अपनी प्रस्तुतियां देते हैं।
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भारत रत्न सम्मान की मांग क्यों उचित है?
भारत रत्न जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान का उद्देश्य है – देश के उन व्यक्तियों को सम्मानित करना जिन्होंने कला, संस्कृति, समाज या राष्ट्र निर्माण में अतुलनीय योगदान दिया हो।
महाराजा चक्रधर सिंह न केवल एक कलाकार थे, वे एक सांस्कृतिक क्रांति के अगुवा थे, जिन्होंने आदिवासी परंपरा, शास्त्रीय संगीत और भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में बाँधकर नई पीढ़ियों के लिए स्थायी धरोहर बनायी।
जैसे बिस्मिल्लाह खां को शहनाई वादन के लिए भारत रत्न मिला — जो कि स्वयं राजा चक्रधर सिंह की शादी में शहनाई वादन कर चुके थे — वैसे ही राजा चक्रधर सिंह को उनके योगदान के लिए यह सम्मान दिया जाना आज की आवश्यकता है।
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समर्थन और पहल:
अखिल भारतीय गोंडवाना गोंड महासभा के राष्ट्रीय सचिव आर. एन. ध्रुव ने इस विषय में राष्ट्रपति महोदया श्रीमती द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को ज्ञापन सौंपा है।
उन्होंने अपील की है कि जिस प्रकार सरकार जनजातीय गौरव सप्ताह जैसे आयोजनों द्वारा देश की मूल निवासी परंपराओं को सम्मान दे रही है, उसी भावना से राजा चक्रधर सिंह को भारत रत्न देकर पूरे आदिवासी समाज को गौरवान्वित किया जाए।
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उपसंहार:
महाराजा चक्रधर सिंह केवल रायगढ़ के नहीं, बल्कि भारत के सांस्कृतिक इतिहास के एक स्तंभ हैं।
उनका भारत रत्न से सम्मानित होना न केवल न्यायसंगत होगा, बल्कि यह भारत की बहुलतावादी, कलामूलक और जनजातीय परंपराओं को दिया गया राष्ट्रीय सम्मान भी होगा।
अब समय आ गया है कि देश अपनी महान सांस्कृतिक विभूतियों को उनका उचित स्थान दे — और राजा चक्रधर सिंह को भारत रत्न से अलंकृत किया जाए।
Author: Shambhoo Dwip
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