ग्राम पंचायत गेतरा / नगर पंचायत शिवनंदनपुर में आदिवासी पारंपरिक कठोरी पंडुम (बीजा पंडुम, अक्ती पूजा, बीज जोगानी) का भव्य आयोजन संपन्न

 

विश्रामपुर जिला सूरजपुर, दिनांक 21/04/2025

ग्राम पंचायत गेतरा / नगर पंचायत शिवनंदनपुर में आदिवासी परंपराओं के अनुरूप कठोरी पंडुम, जिसे बीजा पंडुम एवं अक्ती पूजा भी कहा जाता है, का भव्य आयोजन ग्रामवासियों की सामूहिक सहभागिता व श्रद्धा भाव से संपन्न हुआ। इस आयोजन ने न केवल सांस्कृतिक विरासत को सजीव किया, बल्कि प्रकृति और धरती माता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का सशक्त माध्यम भी प्रस्तुत किया।

ग्रामवासियों ने पारंपरिक रीति से प्रकृति देवताओं की आराधना की। बलि प्रथा के अनुसार सेवा अर्पित की गई और प्रसाद ग्रहण कर प्रार्थना की गई कि वर्षभर गाँव में अन्न की भरपूर पैदावार हो। ग्रामीणों का विश्वास है कि जब तक पेट में अन्न नहीं होता, तब तक कोई भी कार्य सफलतापूर्वक संपन्न नहीं हो सकता।

इस अवसर पर गाँव के बैगा, भूमका, सियान, बुजुर्ग व युवा सहित समस्त ग्रामवासी श्रद्धा से उपस्थित रहे। ‘गोंगो’  में माटी मटयारिन, जागा रानी, जिम्मेदारीन याया , शंभू मूला शिवरिया, बुचागोरिया, दाईं दाउ, डिह डिहारिन, बड़ा देव, ठाकुर देव, सरना देव, बुढ़ा रक्सेल, कुदरगढ़हीन दाई, भिमालपेन , पुरखा शक्ति एवं पंचतत्वों का आह्वान कर ग्रामवासियों की खुशहाली व समृद्धि हेतु आशीर्वाद मांगा गया।

 

**तलुर मुत्ते की आराधना – ग्राम की आध्यात्मिक चेतना का केंद्र**

 

इस आयोजन की विशेषता ‘तलुर मुत्ते’ की सेवा-पूजा रही, जिसकी स्थापना साजा पेड़ के तने में गाँव से बाहर की जाती है। यह स्थान गांव की सामूहिक पूजा का केंद्र होता है, जहाँ हेसांग, चैतरई, बीजा पंडुम, अमाउस, नवाखाई आदि अवसरों पर सबसे पहले पूजा की जाती है।

 

तलुरमुत्ते में महिलाओं द्वारा पिसे या मशीन के चावल का प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि पुरुषों द्वारा पत्थर या लकड़ी से रगड़कर बनाया चावल ही अर्पित किया जाता है। साथ ही धूप-होम, चूजों की सेवा, और अंत में प्रसाद वितरण की परंपरा निभाई जाती है।

 

पूजा के एक दिन पूर्व ‘गायता’ द्वारा उपवास रखा जाता है, जिसे ‘नोमना’ कहा जाता है। शाम को जिमीदारिन में दीपक जलाकर माता की आराधना की जाती है। गायता अपनी साधना के पूर्ण होने की प्रार्थना करते हुए गाँव की रक्षा, समृद्धि व शांति की कामना करता है। दूसरे दिन गाँववासी सामूहिक रूप से तलुरमुत्ते में एकत्रित होकर पूजा संपन्न करते हैं।

 

**संस्कृति, आस्था और एकता की मिसाल**

 

यह आयोजन हमारी आदिवासी परंपराओं को सहेजने और अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने की प्रेरणास्रोत पहल है। गाँववासियों की एकता, सामूहिक भागीदारी, और प्रकृति के प्रति आस्था आदिवासी सांस्कृतिक चेतना को जीवंत रूप में प्रकट करती है

Shambhoo Dwip
Author: Shambhoo Dwip

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