राकेश सांडिल ✒️
सूरजपुर – भारत में आदिवासी समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। हर चुनाव में ये समुदाय राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण वोट बैंक साबित होते हैं। सत्ता में आने से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आदिवासी अधिकारों और उनकी समस्याओं को प्रमुखता से उठाया, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी स्थिति में क्या बदलाव आया?

वादे और हकीकत का अंतर
भाजपा जब विपक्ष में थी, तब वह आदिवासियों के हक और अधिकारों की बात करती थी। उनकी संस्कृति, जल-जंगल-जमीन और आरक्षण जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया जाता था। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही भाजपा, जिसे आदिवासी नेतृत्व भी मिला, उनके अधिकारों को नजरअंदाज करती दिख रही है।
आज जिन आदिवासी सांसदों, विधायकों और यहां तक कि मुख्यमंत्रियों को भाजपा ने सत्ता में बिठाया है, वे अपनी ही जनता की समस्याओं पर चुप्पी साधे हुए हैं। यह सवाल उठता है कि क्या ये जनप्रतिनिधि अपनी भूमिका निभा रहे हैं या केवल एक पार्टी एजेंडे का हिस्सा बन गए हैं?
आदिवासी समुदायों की अनदेखी
1. वन अधिकार कानून की अनदेखी जंगलों पर आदिवासियों का परंपरागत अधिकार रहा है, लेकिन कई जगहों पर इसे कमजोर किया जा रहा है। जंगलों को कॉर्पोरेट हितों के लिए सौंपा जा रहा है, जिससे आदिवासियों के विस्थापन की समस्या बढ़ रही है।
2. आरक्षण पर खतरा समय-समय पर आदिवासी आरक्षण पर सवाल उठाए जाते हैं, जिससे उनकी शिक्षा और नौकरी के अवसर प्रभावित होते हैं।
3. सांस्कृतिक अस्मिता पर संकट आदिवासियों की परंपराओं, भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
4. खनन और औद्योगीकरण की मार कई राज्यों में खनन और औद्योगीकरण के नाम पर आदिवासी भूमि छीनी जा रही है, जिससे उनका जीवन कठिन होता जा रहा है।
#आगे का रास्ता
आदिवासी समुदायों को अब केवल चुनावी मुद्दा बनाकर छोड़ देना न्यायसंगत नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह न केवल उनके अधिकारों की रक्षा करे बल्कि उनकी भागीदारी को भी सुनिश्चित करे। आदिवासी नेताओं को अपनी आवाज बुलंद करनी होगी और जनता को भी सचेत रहना होगा कि उनके अधिकारों का हनन न हो।
विराट अनशन रैली: पदोन्नति में आरक्षण बहाली सहित विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलन
भाजपा सरकार को यह समझना होगा कि आदिवासी सिर्फ एक वोट बैंक नहीं हैं, बल्कि इस देश की असली जड़ें हैं। यदि उन्हें नजरअंदाज किया गया, तो इसका असर न केवल समाज पर बल्कि राजनीति पर भी साफ दिखाई देगा।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी आरक्षण के लिए फिर शुरू हुआ आंदोलन, 16 मार्च को अनशन रैली
छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति वर्ग के 32% आरक्षण और स्थानीय भर्ती को लेकर एक बार फिर आंदोलन की लहर उठ रही है। अनुसूचित जनजाति शासकीय सेवक विकास संघ छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता तिरूमाल आर.एन. ध्रुव ने अपने बयान में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए कहा कि 15 अक्टूबर 2022 को भाजपा द्वारा इस मांग को लेकर पैदल मार्च किया गया था, जिसके बाद छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन हुआ और भाजपा सरकार बनी।

उन्होंने कहा कि इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अधिकांश लोग 2023 विधानसभा चुनाव में विधायक चुने गए और कई मंत्री भी बने। बावजूद इसके, आज भी आदिवासी समाज को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
# फिर से आंदोलन की जरूरत क्यों ?
आर.एन. ध्रुव ने अपनी प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया कि सरकार बनने के बावजूद इन मांगों का समाधान नहीं हो पाया, जिससे आदिवासी समाज को दोबारा आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ रहा है।
उन्होंने आगामी 16 मार्च 2025 को होने वाली अनशन रैली की घोषणा करते हुए उम्मीद जताई कि सरकार, मंत्री और विधायक इस गंभीर समस्या का तत्काल समाधान निकालेंगे। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपने अधिकारों को लेकर जागरूक है और जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलेगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
#क्या है मांग ?
इस आंदोलन के तहत प्रमुख मांगें अनुसूचित जनजाति वर्ग के 32% आरक्षण की बहाली और स्थानीय भर्ती में प्राथमिकता से जुड़ी हैं। ध्रुव ने कहा कि यह आंदोलन सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के हक और अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है।
अब देखने वाली बात होगी कि भाजपा सरकार, जिसमें आदिवासी मुख्यमंत्री और कई मंत्री शामिल हैं, इस पर क्या रुख अपनाते हैं और कब तक समाधान निकलता है।
Author: Shambhoo Dwip
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