**स्थान:** कोरबा, छत्तीसगढ़
**तारीख:** 7 अक्टूबर 2024
छत्तीसगढ़ के कोरबा में विश्व के प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ पर शंभू शक्ती सेना के द्वारा आयोजित पांच दिवसीय बालक-बालिकाओं के प्रशिक्षण शिविर का आज दूसरा दिन था। इस शिविर में मुख्य प्रशिक्षक के रूप में मोहन प्रधान ने विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विचार साझा किए।

#### 1. जनजातीय शिक्षा में पाठ्यक्रम ढांचे का महत्व
शिविर के पहले सत्र में, मोहन प्रधान ने जनजातीय शिक्षा में पाठ्यक्रम ढांचे की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पाठ्यक्रम का सही ढांचा न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाता है, बल्कि आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को भी संरक्षित करता है। इसके अंतर्गत आदिवासी भाषाओं, स्थानीय ज्ञान और जीवन कौशल को शामिल करना आवश्यक है। इसके साथ ही, उन्होंने पाठ्यक्रम की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर दिया।
#### 2. आदिवासी बालिकाओं में शिक्षा के बाधाएं
दूसरे विषय में, आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा की स्थिति और वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा की गई। मोहन प्रधान ने बताया कि आज भी कई आदिवासी क्षेत्रों में बालिकाओं को शिक्षा में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जैसे आर्थिक कठिनाइयाँ, सामाजिक पूर्वाग्रह, और सुरक्षा की कमी। उन्होंने इन मुद्दों को सुलझाने के लिए सामुदायिक जागरूकता और सरकारी प्रयासों को महत्वपूर्ण बताया।
#### 3. उच्च शिक्षा की आवश्यकता

तीसरे विषय में आदिवासियों में उच्च शिक्षा की आवश्यकता और संभावनाओं पर चर्चा की गई। मोहन प्रधान ने बताया कि उच्च शिक्षा से आदिवासी युवा न केवल अपने लिए बेहतर भविष्य बना सकते हैं, बल्कि वे अपने समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को भी सुधार सकते हैं। उन्होंने उच्च शिक्षा की उपलब्धता में सुधार के लिए उचित नीतियों और योजनाओं की आवश्यकता पर जोर दिया।
#### 4. राजनीतिक चेतना और वर्तमान शिक्षा नीति
शिविर के अंत में, मोहन प्रधान ने राजनीतिक चेतना और दृष्टिकोण पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने वर्तमान शिक्षा नीति के अंतर्गत आदिवासी समुदायों की भागीदारी की आवश्यकता को रेखांकित किया। इससे न केवल शिक्षा का स्तर ऊँचा होगा, बल्कि आदिवासी युवा अपने अधिकारों और ज़िम्मेदारियों के प्रति भी जागरूक होंगे।
#### समापन
द्वितीय सत्र के अंत में, मोहन प्रधान ने उपस्थित प्रशिक्षकों को आगामी दिनों के लिए शुभकामनाएं प्रेषित की। उन्होंने सभी को प्रोत्साहित किया कि वे अपने कार्य के प्रति समर्पित रहें और आदिवासी शिक्षा को बढ़ावा देने में योगदान दें।
यह शिविर न केवल ज्ञान का आदान-प्रदान करने का एक मंच था, बल्कि आदिवासी समुदाय की शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी था। आशा है कि इस प्रकार के प्रशिक्षण शिविर आगे भी आयोजित होते रहेंगे और आदिवासी शिक्षा में सकारात्मक परिवर्तन लाएंगे।
Author: Shambhoo Dwip
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