
*18 जून 1576: एक गर्व और आक्रोश का दिन*
*खमनोर की घाटी/हल्दीघाटी*: आज से ठीक 448 साल पहले, 18 जून 1576 को, मेवाड़ की आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की लड़ाई में एक वीरांगना ने अपने प्राणों की आहुति दी। हल्दी बाई भील, एक ऐसी महिला योद्धा थीं जिन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध में पहला रक्त बहाया और अपना जीवन मेवाड़ के सम्मान के लिए समर्पित कर दिया। उनके इस अद्वितीय बलिदान के कारण खमनोर की घाटी को ‘हल्दीघाटी’ कहा जाने लगा।
लेकिन आज, इतने वर्षों बाद भी, क्या हम इस महान वीरांगना के बलिदान को सही मायनों में सम्मान दे पा रहे हैं? क्यों हल्दी बाई भील के शहादत दिवस को व्यापक रूप से मान्यता और सम्मान नहीं मिल रहा?
यह सवाल हमारे समाज और सरकार दोनों से है।
हल्दी बाई भील ने जिस वीरता और साहस का परिचय दिया, वह किसी भी पुरुष योद्धा से कम नहीं था। उनके बलिदान की गाथा को हमारी नई पीढ़ी तक पहुंचाना हमारा कर्तव्य है। आज का दिन सिर्फ श्रद्धांजलि का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी है।
हम सभी हल्दी बाई भील के इस अतुलनीय साहस और बलिदान को शत-शत नमन करते हैं। उनकी वीरता और त्याग हमारे लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेंगे।
**जोहार** ????????????
Author: Shambhoo Dwip
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1 thought on “*हल्दी बाई भील का शहादत दिवस: वीरांगना के बलिदान को क्यों नहीं मिल रहा उचित सम्मान?**”
आपके पास क्या source है इस इतिहास का? या ये नया नया गाढ़ा जा रहा है। अब ये मत कहना वो सब खत्म किया गया। ये पैंतरा पुराना है।