जंगलों से उठी थी जो आवाज़, आज भी ज़िंदा है: रामनगर में वीर गुंडाधुर को श्रद्धांजलि

 


📰 शहीद वीर गुंडाधुर की स्मृति में रामनगर में 116वां भूमकाल दिवस श्रद्धा और संकल्प के साथ मनाया गया

जल–जंगल–जमीन की रक्षा का संदेश, ‘मावा नाटे–मावा राज’ की गूंज

📍 सूरजपुर | 🗓️ 10 फरवरी 2026 | ✍️ रिपोर्ट – विशेष संवाददाता

ग्राम पंचायत रामनगर के सामुदायिक भवन में महान आदिवासी योद्धा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं जल–जंगल–जमीन के प्रथम रक्षक शहीद वीर गुंडाधुर की 116वीं भूमकाल स्मृति दिवस (भूमकाल दिवस) श्रद्धा, गौरव और सामाजिक चेतना के साथ मनाई गई। कार्यक्रम का शुभारंभ वीर गुंडाधुर के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया।

इस अवसर पर बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, युवा, जनप्रतिनिधि एवं ग्रामीणजन उपस्थित रहे। पूरे कार्यक्रम के दौरान वातावरण वीर गुंडाधुर अमर रहें, भूमकाल के नायक को नमन जैसे नारों से गूंजता रहा।


🗣️ भूमकाल विद्रोह आदिवासी अस्मिता की सबसे बड़ी लड़ाई – बी.पी.एस. पोया

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में सोशल एक्टिविस्ट एवं सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग के जिला अध्यक्ष बी.पी.एस. पोया ने संबोधन देते हुए कहा कि वर्ष 1910 में बस्तर क्षेत्र में हुआ भूमकाल विद्रोह अंग्रेजों की दमनकारी वन नीतियों के विरुद्ध आदिवासी समाज का ऐतिहासिक आंदोलन था।

उन्होंने कहा कि अंग्रेजी शासन द्वारा लागू की गई नीतियों के कारण आदिवासियों को अपने ही जंगलों से बेदखल किया जा रहा था। जल, जंगल और जमीन पर अधिकार छीने जा रहे थे, जिसके विरोध में वीर गुंडाधुर ने बस्तर के घने जंगलों से क्रांति की मशाल जलाई


🔥 वीर गुंडाधुर के नाम से कांपती थी अंग्रेजी हुकूमत

बी.पी.एस. पोया ने कहा कि वीर गुंडाधुर के नेतृत्व में आदिवासी समाज इतना संगठित हो गया था कि ब्रिटिश अधिकारी आसपास आने से भी भयभीत रहते थे। उनके नाम मात्र से अंग्रेजी शासन कांप उठता था।

यह आंदोलन केवल बस्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के वन क्षेत्रों तक फैल गया। आदिवासियों ने अपनी अस्मिता, परंपरा और पर्यावरण की रक्षा के लिए संगठित संघर्ष किया।


🌱 आज भी जारी है जल–जंगल–जमीन की लड़ाई

मुख्य वक्ता ने वर्तमान हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि आज भी आदिवासी क्षेत्रों में—

  • उद्योगपतियों का बढ़ता हस्तक्षेप
  • खनन और जंगल कटाई
  • विस्थापन
  • पर्यावरण प्रदूषण

जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले रही हैं। इससे आदिवासी समाज गरीबी, बेरोजगारी और सांस्कृतिक क्षरण का शिकार हो रहा है।

उन्होंने समाज से आह्वान किया कि वीर गुंडाधुर के आदर्शों को अपनाकर संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा हेतु एकजुट होना समय की आवश्यकता है


📚 वीर गुंडाधुर को पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग

बी.पी.एस. पोया ने छत्तीसगढ़ सरकार से मांग की कि—

  • शहीद वीर गुंडाधुर के नाम पर चौक–चौराहे, कॉलेज, विश्वविद्यालय एवं अस्पताल स्थापित किए जाएं
  • राज्य के शैक्षणिक पाठ्यक्रम में उनके जीवन और भूमकाल आंदोलन को शामिल किया जाए
  • भूमकाल दिवस को राज्य स्तरीय आयोजन का दर्जा दिया जाए

ताकि नई पीढ़ी अपने नायकों और इतिहास से परिचित हो सके।


🏹 गोटूल परंपरा के पुनर्जीवन पर जोर

उन्होंने समाज से गोटूल परंपरा को पुनर्जीवित करने की अपील करते हुए कहा कि यह आदिवासी समाज की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ रही है।
अपने कर्तव्यों के सही निर्वहन से ही “मावा नाटे, मावा राज” की भावना जीवित रह सकती है।


👥 इनकी रही गरिमामयी उपस्थिति

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में—

संतोष पावले, विपेंद्र कोर्राम, आनंद सिंह मरकाम, दीपक उइके, गुरुदयाल उइके, जयसिंह उइके, शोभनाथ उइके, हीरालाल प्रजापति
तथा ग्राम पंचायत रामनगर की सरपंच श्रीमती संगीता रोहित प्रताप सिंह,
सचिव ध्रुवेंद्र प्रताप सिंह सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता एवं ग्रामीणजन उपस्थित रहे।


श्रद्धा से संकल्प तक

कार्यक्रम के अंत में उपस्थित जनसमूह ने यह संकल्प लिया कि वे—

  • जल–जंगल–जमीन की रक्षा करेंगे
  • अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेजेंगे
  • वीर गुंडाधुर के विचारों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएंगे

भूमकाल दिवस का यह आयोजन आदिवासी चेतना, आत्मसम्मान और अधिकारों के पुनर्जागरण का सशक्त मंच बनकर उभरा।

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Shambhoo Dwip
Author: Shambhoo Dwip

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