गोंडवाना के एक गुमनाम नायक प्रफुल्लचंद्र भंजदेव: जिन्हें इतिहास ने नहीं, लेकिन समय ने याद रखा

**गोंडवाना के एक गुमनाम नायक – प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव : जिन्हें किसी ने कभी याद नहीं किया**

*(1908 – लगभग 1960)*

**एक भूली हुई किताब और एक भुला दिया गया नाम**

“Financial Position of Government of India (How decay has set in)” – यह किताब आज इतिहास के अंधेरे कोनों में कहीं गुम हो चुकी है, ठीक वैसे ही जैसे इसके लेखक प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव भी हमारे राष्ट्रीय स्मरण से लुप्त हो गए हैं। यह पुस्तक भारत में ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों पर गंभीर टिप्पणी करती थी, लेकिन अफसोस, आज न वह पुस्तक उपलब्ध है और न ही उसके लेखक का नाम हमारे मौजूदा विमर्श में स्थान पा सका है।

**प्रारंभिक जीवन और शिक्षा**

प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव का जन्म मई 1908 में उड़ीसा के मयूरभंज राज्य में हुआ था। वे राजा दामचंद्र भंजदेव के पुत्र थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजकुमार कॉलेज, रायपुर में हुई थी। वे कुशाग्र बुद्धि, दृढ़निश्चयी और सिद्धांतों के प्रति कटिबद्ध व्यक्ति थे। उनका जीवन संघर्ष, आदर्श और अदम्य साहस का प्रतीक रहा।

**एक जबरन विवाह और उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि**

1920 के दशक में अंग्रेजों ने बस्तर की नाबालिग महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी का विवाह प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव से करवाने की साजिश रची। ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेटर टकर और पॉलिटिकल एजेंट ली ने इस विवाह को थोपने के लिए तमाम राजनीतिक दबाव डाले। इस साजिश का खुलासा ‘बस्तर राज पर विपत्ति’ नामक आलेख और ‘प्रस्तावित बस्तर-मयूरभंज सम्बन्ध का रहस्योद्घाटन’ नामक पुस्तिका में हुआ था।

यह विवाह प्रारंभ में एक राजनीतिक साजिश था लेकिन समय के साथ यह एक गहरी आत्मीयता और परस्पर सम्मान की नींव पर खड़ा हुआ एक सच्चा संबंध बन गया। यह मिलन सिर्फ दो राजवंशों का नहीं बल्कि दो संस्कृतियों, दो आदिवासी परंपराओं और दो जागरूक राजनीतिक चेतनाओं का संगम था।

**प्रफुल्ल भंजदेव : बस्तर में राष्ट्रीय चेतना के वाहक**

प्रफुल्ल भंजदेव जब बस्तर आए तो उन्होंने बस्तर की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना में नई जान फूंकी। वे न केवल महारानी के सलाहकार बनकर उभरे, बल्कि धीरे-धीरे बस्तर के लोगों के हक में आवाज़ उठाने वाले एक अग्रणी नेता के रूप में भी ख्यात हुए।

जब निजामशाही की दृष्टि बस्तर पर पड़ी, तो अंग्रेजों ने प्रफुल्ल को धन, ज़मींदारी और अन्य प्रलोभनों से अपने पक्ष में करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने स्पष्टतः बस्तर और उसकी स्वायत्तता का पक्ष लिया। यही कारण था कि अंग्रेजों ने उन्हें इंग्लैंड भेज दिया — एक तरफ उच्च शिक्षा के नाम पर, दूसरी तरफ बस्तर से दूर रखने की रणनीति के तहत।

**इंग्लैंड में शिक्षा और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ाव**

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान वे श्रीकृष्ण मेनन के संपर्क में आए और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ गए। उन्होंने ‘द न्यू स्टेट्समैन एंड नेशन’ में एक लेख लिखा, जिसमें राजाओं की ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली द्वारा हुई ‘राजनीतिक नपुंसकता’ पर सवाल उठाया गया। इस लेख के बाद उन्हें अंग्रेजों की नाराज़गी और दुष्प्रचार का शिकार होना पड़ा।

उन्हें डरपोक, व्यसनी और रोगग्रस्त बताकर बदनाम करने की कोशिश की गई। उनके भत्ते कम कर दिए गए और फिर पूरी तरह बंद कर दिए गए।

**प्रवीरचंद्र का राज्याभिषेक और प्रफुल्ल की मुखरता**

जब महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हुई, तो भंजदेव ने उसे एक साजिश बताया और सार्वजनिक रूप से अंग्रेजों पर हत्या का आरोप लगाया। इस साहसिक वक्तव्य के बाद उन्हें बस्तर से निष्कासित कर दिया गया। अपने पुत्र प्रवीरचंद्र भंजदेव के राज्याभिषेक के बाद कुछ समय के लिए वे बस्तर लौटे, लेकिन फिर एक बार झंडा विवाद के कारण पिता-पुत्र में मतभेद हो गया और वे हमेशा के लिए बस्तर छोड़ गए।

**गुमनामी की ओर बढ़ते कदम**

प्रफुल्ल भंजदेव स्वतंत्रता के बाद ओडिशा लौटे, लेकिन ओडिशा सरकार की आदिवासी विरोधी नीतियों के कारण उन्होंने वहां की राजनीति से भी खुद को अलग कर लिया। उन्होंने दिल्ली, कलकत्ता और मयूरभंज में गुमनामी का जीवन जिया। उनका अंतिम समय कब और कैसे बीता, इस पर कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। अनुमान है कि उनका निधन 1960 के आसपास हुआ।

**उपसंहार : एक अदृश्य नायक की जीवंत विरासत**

प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव का जीवन आदिवासी चेतना, स्वतंत्रता संग्राम और राजनैतिक सिद्धांतों के लिए खड़े होने की मिसाल है। उन्होंने न पद चाहा, न प्रचार; उन्होंने केवल अपने नैतिक मूल्यों के लिए संघर्ष किया। वे गोंडवाना के एक ऐसे नायक थे जिन्हें इतिहास ने भुला दिया, लेकिन जिन्हें हमें आज फिर से याद करने की आवश्यकता है।

बस्तर की राजनीतिक विरासत को समझने के लिए प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव की भूमिका को समझना और सम्मान देना अनिवार्य है। वे उन नायकों में से हैं जो गुमनामी में खो गए, पर जिन्होंने इतिहास की धारा को दिशा दी।

**– लेखक : एस. के. मरकाम**

संलग्न कर्ता – राकेश सांडिल

Shambhoo Dwip
Author: Shambhoo Dwip

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